बैहयाई के बीच हाॅपनी भरता सिस्टम , बैलगाम हुये पैरोकार



बगैर चढाबा चढाये धेला तक मिलना मुश्किल 

वीरेन्द्र शर्मा 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

खबर अपुष्ट है और प्रमाण सबूत विहीन ऐसे समाधान की उम्मीद करना भी बैमानी हो जाती है मामला उन संस्थाओ की माली हालत का है जिनके कंधो पर विकास का भार है मगर कंगाल खजाने पर कसरत करते उन संस्थाओ का क्या जिन्है बगैर चढ़ोत्रा चढ़ाये धेली तक नसीब नही हो रही इकन्नी दुअन्नी से शुरू यह कारोबार अनौपचारिक तौर पर अब 5-6 रूपइये तक जा पहॅुचा है ऐसे मे कमाउ पूत भी बगले झाकते नजर आते है यह सही है की चर्चाओ मे सरगर्म ऐसी चर्चाओ का प्रमाण मिल पाना मुश्किल हो मगर आज का सच यही है क्योकि बैलगाम सेवको का कारबाॅ जिस तरह से सेवा कल्याण को ढो रहा है उस टिप्पणी करना उनके साथ अन्याय होगा क्योकि उनकी निष्ठा पर उगली उठाना हिमालय को उठाने जैसा होगा जिसमे जान माल का भी बड़ा खतरा हो सकता है सो अपुन तो फिलहाॅल इतना ही कह सकते सेवा कल्याण पर टूटे सेवको से कि अगर समय रहते इस संस्कृति पर उपर विराम नही लगा तो आने बाले समय या मौजूद पीढ़ी के आगे सर छिपाने के अलावा शेष कुछ न होगा जो किसी भी सभ्य समाज के लिये शर्मनाक भी होगा और दर्दनाक भी होगा । 

 

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