सुशासन के सर्रराटे से हलक मे, अटकी जान
माईबापो को सिर्फ संतुष्टि का सहारा...........तीरंदाज
व्ही. एस. भुल्ले
भैया- सुशासन न हुआ यह तो म्हारे माईबापो को कोराना का बाप हो लिया क्योकि सौ फीसद संतुष्टि ही इसका मुकंबल इलाज माना जा रहा है भगवान की सेवा मे भक्तो की मण्डली ने माईबापो के गले मे सी. एम. हैल्प लाइन की ऐसी घुग्गी फसाई है कि सेवा कल्याण मे जुटे म्हारे माईबापो को न तो उगलते बन रहा न ही निगलते बन रहा अब अगर थारे पास कोई कारगार नुख्सा हो तो हाथो हाथ म्हारे माईबापो को बता और कैसै भी हो रीछ के पैर पकड़ खेल से म्हारे सहारा बने सेवको की जान छुड़ा ।
भैयै - कै थारे को मालूम कोणी बैहतर सेवा कल्याण थारे माईबापो की सेवा मे शामिल है और निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन शफत मे है अगर ऐसे मे सुशासन की खातिर म्हारे माननीयो ने सौ फीसद शिकायत निवारण का कोई फाॅरमूला ढूड़ा है तो इसमे गलत क्या ? जब सारी सुख सुबिधाओ के साथ मोटी मोटी पगार कंगाल खजाने से बैनागा हर माह दी जा रही है तो फिर सौ फीसद सेवा कल्याण की गारंटी क्यो नही ?
भैया - हर रोज शिकायतो का अंबार लग रहा है सारा समय बैबीनार वीडियो कान्फ्रेन्स और बैठको मे निकल रहा है फिर हार्ड साफट काॅपी मे नये नये प्रोफार्मो मे जानकारिया जुटाना तथा माननीय श्रीमानो की सेवा मे यथा स्थान पहुॅचाना भी तो उन्ही की जबाबदेही है फिर शासकीय सेवा मे अभयदान प्राप्त सतरंगी सैना से काम लेना भी तो उन्ही की जबाबदेही है हर एक का सत्ता सियासत मे अपना अपना ईष्ट देव है तो कोई घोल्लाओ की शरण मे है जिनके आगे बड़े बड़े तांत्रिक सिद्ध पुरूष भी फैल है ऐसे मे म्हारे माईबापो की क्या गलती है ।
भैयै - ये तो लोकतंत्र मे सेवाकल्याण के अस्त्र शस्त्रो से लदा जहाज है जिस कन्धो पर समुचे जीव जगत के कल्याण का भार है अब अगर ऐसे मे समस्याओ से सीधा मोर्चा लेने की बारी है तो हर्ज क्या ? जनतंत्र मे तो बैसै भी जनता भगवान होती है अगर पुजारी की इच्छा है कि भगवान की सेवा सौ फीसद टंच हो तो पुण्य प्रताप के भागीदार तो माईबाप भी होगे अगर कलयुग मे पुण्य कमाने का मौका म्हारे माईबापो को मिला है तो मने तो बोल्यू रोना धोना छोड़ माई बापो को मय अण्डी बच्चो के सेवा मे जुट जाना चाहिए और हाथो हाथ गाड़ी भरा पुण्य अपने कमा धन्य हो जाना चाहिए ।
भैया - मने समझ लिया थारा इसारा सुशासन की जुगं मे अब लगता म्हारे माईबापो की कतई नही सुनी जायेगी कैसै भी हो सौ फीसद संतुष्टि ही अब म्हारे कुनबे को बचा पायेगी मगर भाया तने भी कान खोल कर सुनले आज नही तो कल इस वैज्ञानिक युग मे म्हारी सांख्यकी ही काम आबेगी इतनी कड़ी मेहनत जो हमने आज तक की है उसका थोड़ा रेसो बड़ा लेगे और पुजारियो को भी अपने हुनर का लोहा मनवा आने बाले समय मे परलोक सुधारने चारोधाम की यात्रा करा देगे तब तो चल जायेगी मगर म्हारा परलौक बिगाड़ने बालो की लुटिया भी इस महान सेवाकल्याण के यज्ञ मे तैरती नजर आयेगी । बोल भैया कैसी रही । जय स्वराज ।

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