यथार्त को त्याग, इतिहास, विज्ञान मे उलझा जीवन


समृद्ध जीवन को, समझ और ज्ञान की दरकार 

व्ही.एस. भुल्ले 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

जिस तरह कि प्राकृतिक सामाजिक सियासी आपदाओ से जीवन बैहाल है यह इस बात के स्पष्ट संकेत है कि कही तो कुछ गलत हो रहा है जो हमारी समझ ज्ञान को चुनौती देने तैयार ही नही हमे चेतन्य बनाने कई संकेत समय बे समय देती रहती है मगर हम कि समझने ही तैयार नही न ही हम सीखने समझने का कोई ऐसी ब्यवस्था स्थापित कर सके जो समृद्ध जीवन निर्माण मे सहायक हो सके । कारण यथार्त को त्याग जिस तरह से हम इतिहास विज्ञान मे खुशहाॅल जीवन की तलाश मे जुटे है वह सार्थकता से कोसो दूर है कहते इतिहास विज्ञान जीवन को सार्थक बनाने मे सहायक तो हो सकते है मगर सम्पूर्ण समाधन नही यह आज हर समझदार और विद्ववानो के लिये समझने बाली बात होना चाहिए । 

जिस तरह से साख्किीय की अनदेखी कर यथार्त की कीमत पर हमने समृद्धि को अंगीकार किया है उसकी कीमत तो हमे आज नही तो कल चुकानी ही है। क्योकि यह क्रम आज भी अनवरत जारी है राहत के नाम नगद राशि जीवन की कीमत बनती जा रही है बजाये सीख लेने के तो परिणाम तो घातक होने ही है क्योकि सत्ता के लिये वावलि सियासत और सतत सत्ता मे बने रहने का नशा हम ही नही हमारे अपनो पर सर चढ़कर बोल रहा है जो भी सत्ता मे आता है उससे विछड़ना नही चाहता और यही कारण है कि जिनके कंधो पर मानव जीवन ही नही समुचे जीव जगत के खुशहाॅल समृद्ध जीवन का भार है वह यथार्त को जानने बूझने और समझने के बाबजूद सत्तासुख के आगे न तो उसे अंगीकार करने तैयार है न ही जन, जीव हित मे उसे स्वीकारने तैयार है जो स्वयं उनके ही नही समुचे जीव जगत के लिये आने बाले समय घातक सिद्ध होने बाला है आज सभी के लिये यह समझने बाली बाज होना चाहिए । जय स्वराज ।  


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