सत्ताओ की सियासी हट मे सिसकते सरोकार, बीच चैराहे बिलखता बैचारा सेवा कल्याण
विधान पर भारी, माननीय श्रीमानो की सेवा, सम्मान
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
सेवा सर्बकल्याण के नाम जिस तरह से लोकतंत्र मे माननीय श्रीमानो का सेवा सम्मान विधान पर भारी पढ़ रहा है उसमें सत्ताओ की सियासी हट स्पष्ट नजर आती है क्योकि जिस तरह से बीच चैराहे सेवा कल्याण बिलख जीवन के सरोकार सिसक रहै है ऐसे मे सर्बकल्याण की उम्मीद बैमानी हो जाती है मगर कहते है उम्मीद पर आसमान टिका है सो जनतंत्र मे आस्था रखने बाले हर इन्सान को धृतराष्ट्र् की सभा की भाॅति बड़े बड़े शूरवीरो की भांॅती आज भी करना चाहिए क्योकि अब न तो सभाओ मे विदुर बचे न ही कोई कृष्ण बनने तैयार जो आज के दृर्योधनो कि बात का विरोध कर सके और सभा को सर्बकल्याण की नीति से आगाह करता रहै अब ऐसे मे स्वयं जन की जबाबदेही बनती है कि वही सारथी बन मानव धर्म की ध्वजा लेकर आगे चले और सियासी हटो का जमकर सामना कर सके क्योकि सत्ता सियासत से टूटता विश्वास और सभा परिषदो की शोभा बढ़ाती बैधानिक संस्थाओ में बैठै अधिकांश सदस्यो मे अब लगता वह मादा नही रहा जिससे मानव धर्म की रक्षा और जीवन मूल्यो को बचाया जा सके । सियासी अभियानो मे जुटी सत्ताओ को फुरसत ही नही कि वह छड़िक भी सर्बकल्याण मानव कल्याण जीवन सरोकारो के बारे मे सोच सके और स्थापित संस्थाये अपने मूल सेवा धर्म की रक्षा कर सके दिन भर मीटिगं बैठको की बाढ़ और जीवन मूल्यो को धता बताते सरोकार इस बात का प्रमाण है कि हमने कितनी की तरक्की क्यो न कर ली हो मगर हम आज भी जीवन मूल्यो की रक्षा उनके संरक्षण संबर्धन मे अक्षम असफल साबित हो रहै है हम स्वयं को कैसै बैधानिक विधि का निष्ठापूर्ण निर्वहन कर्ता घोषित कर सकते है जब आय दिन विधि उल्लघन के विधि संबत लोग हमारे अपने ही होते है फिर वह किसी संस्था संगठन के भाग हो या फिर सभा परिषद मे नेतृत्व करने बाले अब तो जघन्य से जघन्य मामलो मे भी भाई लोग शर्म से नही गर्व से बचाव करते है तो वही दागदार मलाई लूटा स्वयं को सच्चा सेवक सिद्ध करने से नही चूकते है । सेवा काल पश्चात संस्थाओ की शोभा बढ़ाते लोगो से संथाये पटी पढ़ी है तो कई संस्थाओ मे तो संक्षम संचालन कर्ता ही नही रहै उधार के कर्ताओ कि दम पर ही फल फूल रही है चैपट होती संस्थाये आखिर कहै भी तो किससे वह तो अस्तित्व से पूर्व ही बैजुवान है और अब संचालन कर्ता सत्ता सिंहासन से भीष्म से बधे है ऐसे में उन्है अंगीकार विधान से प्राप्त बैधानिक अधिकार भी न काॅफी साबित हो रहै है । ऐसे मे समझने बाली बात अब सिर्फ उन्ही लोगो को रह जाती है जिनकी आस्था अंगीकार विधान मे और जिनके लिये मानव धर्म जीवन मूल्य ईश्वर के समान है क्योकि टूटते विश्वास के बीच अगर विश्वास कायम नही रहा तो हम ही नही हमारी कई पीढ़िया इस कर्तव्य विमुखता का दंश झेलेगी और तब हमारा जीवन भी समृद्ध खुशहाॅल रहने किसी भीख का मोहताज । आज यही सबसे बढ़ी समझने बाली बात होना चाहिए । जय स्वराज ।

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