नही बचा सके , पूर्वजो कि श्रेष्ठतम कृति

 

कलंकित होती विरासत , विलबिलाती मानव सभ्यता 

व्ही. एस. भुल्ले 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कभी जिस मानव को अपनी सर्बोत्तम कृति मान रचयिता ने उसके मार्ग के अनुशरण का सच्चा माध्यम माना और उस सर्बकल्याण मे निष्ठापूर्ण योगदान का उत्तराधिकारी जाना आज वही मानव सभ्यता सरेयाम विलबिलाने पर बैबस मजबूर है । अगर हम यो कहे कि हम अपने पूर्वजो कि लाख तपस्या त्याग कुर्बानियो से संग्रहित बहुमूल्य उनकी विरासत को बचाने मे आज अक्षम असफल सिद्ध हुये तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । अतिसंयोक्ति उन लोगो को भी नही होनी चाहिए जो स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध कर निकंमे नकाबिल सिद्ध हो रहै है । इस सच्चाई पर धूल डालने कई श्रेष्ठजनो के अपने अपने तर्क हो सकते है तो संबोधित वाक्य चुभ सकते है मगर पूर्वजो की श्रेष्ठतम कृति मानवता को लज्जित करने बाले उन श्रेष्ठजनो को चुभना भी चाहिए । क्योकि मानव को श्रेष्ठ सिद्ध करने महापुरूषो का मानव रूप मे ही इस पृथ्वी पर अवतरण हुआ अगर विधान मे जिसकी आस्था है तो संबोधित कथन सत्य है । जिसमे अब भी कोरोना कहर के बीच किसी को भी स्वीकारने की बाध्यता नही है । क्योकि भूत था जो घट चुका भबिष्य का किसी को पता नही फिलहाॅल बर्तमान सामने है जिसे अस्वीकारना अब किसी के भी बस की बात नही लोगो कोरोना महामारी से मर रहै है संक्रमित हो रहै है और अब संक्रमण सहित मृत्यु दर भी रफतार पकड़ चुकी है जिसे थामने मे अच्छे अच्छो के पसीने छूट रहे है । हो सकता है मानव जीवन का श्रेष्ठतम विधान त्याग सर्बकल्याण के स्वयं भू कमांडरो का विधान स्वीकार कर अंगीकार करने बाले अभी भी समृद्ध स्वस्थ खुशहाॅल जीवन की मौजूद साक्षात कृति , ज्ञान , विज्ञान से सहमत न हो और हो भी क्यो क्योकि जो जीवन का ककहरा अब स्वयं भू जीवन का मौजूद है उनसे हमे इसी तरह की महामारियो प्राकृतिक आपदाओ से आय दिन रूवरू होना पढे़गा । क्योकि जिस भव्य , दिव्य , श्रेष्ठ ज्ञान को त्याग आज हम यहाॅ तक पहुॅचे है और जिस ज्ञान विज्ञान तथाथित विद्ववानो पर हम गर्व करते नही थकते है और हाथो हाथ तारे तोड़ लाने का आने बाले समय सपने बुन रहै है परिणाम सामने है हो सकता है यह अध्यात्म की बात हो और होना भी चाहिए क्योकि अध्यात्म का भी जीवन मे अब कितना महत्व शेष रहा है सो उस पर गर्व किया जाये क्योकि जब तक वैज्ञानिक आधार पर या विज्ञान मे जो सिद्ध न हो हमे ऐसी किसी बात को नही मानना चाहिए जो जम्बूदीप मे कही गई हो । मगर एक सिद्ध सत्य की चर्चा मौजूद पीढ़ी को अवश्य करना चाहिए । कि आजादी पूर्व और आजादी के बाद कितने पीपल , बरगद , नीम , तुलसी के वन जंगल वृक्ष इस महान भारतबर्ष मे लगाये गये और कितने वृक्ष किन किन प्रजातियो के लगाये गये । कौन है जिसने गौचर का जगलो से दूर किया और कौन है वह लोग जो गाॅब गाॅब शहर शहर गौवंश की भूमि गौचर भूमि को हड़प गये । 

नही मालूम तो कभी पीपल बरगद नीम जहाॅ भी लगा हो सीख कर आना कोई फीस किसी पढ़ाने बाले की जरूरत नही वह खुद ही अपना मूल्य उनका महत्व जीवन मे क्या है समझा देगे । जिस सज्जन के गाय हो उस सज्जन से पूछ कर आना उसे क्या लाभ है उसके बाद विज्ञान मे सिद्ध डाॅक्टर के पास जाना कि इनकी जीवन या इनसे तैयार प्राप्त उत्पात की मानव जीवन ही नही समस्त जीव जगत मे क्या उपयोगिता है । फिर भी समझ न आये और सुनहरे भबिष्य की चिन्ता सताये तो निश्चित ही यह अध्यात्म सिद्ध होगा वरना सही विज्ञान सिद्धान्त सहित सामने होगा । कहते है जब तक जीवन स्वस्थ है तभी तक जीवन की समस्त उपलब्धिया उत्पात जीवन को श्रेष्ठतम सुख उस जीवन की सिद्धता का एहसास कराने मे सक्षम सिद्ध होगी वरना जीवन का शेष अर्थ कोरोना समझने समझाने मैदान मे जिससे मुक्ति कब मिलेगी इसका जबाब हो सकता है न तो विज्ञान के पास हो न ही उन मूड़धन्न महानुभावो के पास जिन्हे अपनी स्वयं भू श्रेष्ठता पर गर्व भी है और जो गैंगबन्द हो स्वयं पर गौरव कर गौरान्वित होने मे गर्व मेहसूस करते है ।

फिलहाॅल वक्त अब चर्चा परिचर्चा का नही न ही आरोप प्रत्यारोप का अगर कोरोना का कहर टूट ही पढ़ा है तो वह भी मानव के रूप मे मौजूद मानवता की श्रेष्ठ कृति का कुछ भी उखाड़ नही पायेगा बस हमे मुॅह पर मास्क गमछा तौलिया घर से निकलते वक्त लगाना हे और बहुत जरूरत होने पर ही घर के बाहर जाना है बार बार हाथ साफ करना है साबुन राख से , किसी से भी मिलते वक्त दो गज दूरी बनाये रखना है और घर मे प्रवेश से पूर्व सारे अंग बस्त्र साबुन सर्फ से धोने के पश्चात साबुन से नहाना है फिलहाॅल मौसम अनुसार फल जल का सेवन भी जीवन मे उत्तम माना गया । जय स्वराज । 

 


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