दण्ड अभाव का दंश भोगता मानव जीवन


श्रेष्ठजन की उपेक्षा बनी आफत का कारण 

अगर दूषित विधान में आस्था है तो विपदाओ से गुरेज क्यो ? 

व्ही. एस. भुल्ले 


विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

कहते है विधान तो यह था कि कभी श्रेष्ठजन , राजा , सत्ताओ की आस्था ईश्वरीय विधान में हुआ करती थी और उनके कंधो पर प्रकृति मे मौजूद हर जीवन के संरक्षण संर्बधन  सुरक्षा के साथ निष्पक्ष न्याय देने या दिलाने की जबाबदेही सुनिश्चित हुआ करती थी । जिसका निष्ठापूर्ण निर्वहन हर श्रेष्ठजन , राजा , सत्ता या जीवन के बीच मौजूद हर उस शक्तिशाली , श्रेष्ठ जीवन का धर्म और श्रेष्ठ कर्म होता था जिसमे दण्ड का विधान हर उस जीवन के लिये था जो सुष्टि सजृन के लिये समर्पित विद्या या विद्यवान , सृजनकर्ताओ के लिये कंटक सिद्ध होता था सत्ता राजाओ का उस समय धर्म था की वह निष्पक्ष न्याय के माध्यम से उन्है संरक्षण दे उनकी रक्षा करे और यह इतिहास ही नही विधानो से भी सिद्ध है । अगर यो कहे कि वृक्ष पौधे पशु पक्षी जानवर जीव जन्तुओ मे जीवन की श्रेष्ठतम कृति मानव को माना गया तो इसमे किसी को अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । और हो भी क्यो न क्योकि इस सत्य से सभी विदित है कि पृथ्वी पर मौजूद समस्त जीवनो सिर्फ एक ही ऐसा जीवन है जो अन्य जीवनो मे कुछ अधिक श्रेष्ठता रखता है और वह मानव जीवन ही है क्योकि पेड़ पौधे वृक्ष समुचे जीवन मे निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन के स्वभाव से स्थाई है जो जीवन को निष्पक्ष बगैर किसी भेदभाव के फल फूल जीवन दायनी वायु मानसून नियमित प्रदान करने के बाबजूद जीवन का संकट होने पर जान बचाने भागने मे अक्षम है अगर कोई उनका जीवन समाप्त भी उन्ही के सामने कर दे तो वह विरोध करने मे भी अक्षम होते है । ठीक उसी प्रकार पशु पक्षी जानवर को जीवन बचाने प्रतिरोध करने और भागने की सुविधा है मगर किसी ऐसी तरकीव को इजात करने की सुविधा नही जिससे वह संकट के छणो मे अपनी प्रमाणिक रक्षा जीवन की कर पाये वह सिर्फ मानव ही जिसे विवेक अनुसार कई सारी क्षमताये अपने सामर्थ पुरूषार्थ से सिद्ध करने की है जिसमे दया है तो आक्रोश भी है स्वकल्याण का भाव है तो सर्बकल्याण का भाव भी है जिसमे समझ के साथ प्रकृति गूढ़ रहस्यो को समरूने की क्षमता भी है इसलिये इस पृथ्वी पर जितने भी महापुरूष महामानव हुये उन्होने मानव जीवन का ही निर्वहन किया और अपने सामर्थ पुरूषार्थ से मानव धर्म का पालन करते हुये सृष्टि सजृन मे जीवन खपाने बाले मानव महामानवो के जीवन की रक्षा कर जीवन के अर्थ और मानव जीवन की जीवन मे महत्वता को भी सिद्ध किया । मगर आज जो कुछ भी जीवन मे घट रहा है यह भी मानव जीवन का ही प्रताप है जहाॅ न्यायपूर्ण पुरूषार्थ के अभाव मे मानव जीवन कंटको को भरा पढ़ा है उचित संस्कार शिक्षा सर्बकल्याणकारी सत्ताओ के अभाव मे जीवन अब स्वयं संकट बन गया ऐसे मे अनभिज्ञ आपदाओ से जूझता जीवन कब तक सुरक्षित रह पायेगा यह देखने बाली बात होगी फिलहाॅल तो कोरोना संक्रमण से समुचा मानव समाज सकते मे पढ़ा है और शासन सत्ताओ मे का मजा किरकिरा हो रहा है । ऐसे मे देखना होगा कि क्या सत्ता और सामर्थ को शर्म या सदबुद्धि आती है या फिर बिलबिलाते मानव जीवन की कहानी इसी तरह श्रष्ठजनो के सामने गिड़गिड़ाती है । कि है श्रीयजनो अब तो कुछ करो हमारी अटूट आस्था और विश्वास तो समृद्ध खुशहाॅल सुरक्षित जीवन की पृत्याशा मे आप ही से रही है जिसके लिये आपने जिस भी विधान को अंगीकार करने का आदेश किया हमने उसका समझ अनुसार अक्षरशः पालन अभावो मे जिन्दा रहने के बाबजूद भी मगर अब हमारे अपने हमारे सामने मर रहे है और न तो हम और न ही आप कुछ कर पा रहै संक्रमितो के आकड़े आपके हमारे सामने है आप सक्षम है समृद्ध है शक्तिशाली है आप कुछ कर सकते कृपया कुछ तो करो हमारी आप मे पूर्ण आस्था विश्वास है कहा सुना माफ करना हम न समझ है । जय स्वराज । 


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