सार्थक समाधान मे सभी को सुनना , सत्ताओ का धर्म
सर्बकल्याण मे ओछा स्वार्थवत ,सियासी विरोध शर्मनाक
सियासी मसूबो के आगे श्रेष्ठ , सज्जन , प्रबुधजनो का तिरस्कार संकट का मूल कारण
शोध , संसाधन , सील , सप्लाई पर काम हुआ होता तो आज यह दिन देश को न देखना पड़ता
आज भी लाखो संक्रमित हजारो जाने जा चुकी है
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
भले ही देश मे जनवरी तक दो सौ सौलह करोड़ डोज उपलव्ध होने की बात हो चुकी हो मगर संक्रमण और मृत्यु दर मे कोई बड़ी गिरावट का दर्ज न होना निश्चित ही बड़ी चिन्ता का बिषय है मगर जिस तरह से शोध , संसाधन , शील , सप्लाई के सार्थक सिद्धान्त की शुरू से ही अनदेखी हुई उसी का परिणाम है कि देश को आज यह दुरदिन देखने पढ़ रहै है अगर शुरू से अनजाने मे ही सही मैकाले सिद्धांत मे शिक्षित प्रशिक्षित सिस्टम के साथ व्यवहारिक ज्ञान समझ रखने बालो की टीम सियासी समझ से इतर लगायी होती तो आज बगैर किसी अपराध के देश की जगहसाई न होती मगर जिस शर्मनाक आचरण का प्रदर्शन विरोध के नाम देखने सुनने देश बासियो को मिल रहा है वह बड़ा ही दर्दनाक है कि लोग कोरोना से तड़फ तड़फ कर मर रहै है लाखो की संख्या मे हर रोज संक्रमित हो रहै ऐसे मे देश के मान सम्मान को दरकिनार कर हलकट विरोध कही से श्रेष्ठ नही ठहराया जा सकता मगर यह सब भी हो रहा है । जो गलती बतौर मुखिया जाने अनजाने मे श्रेष्ठतम सोच के चलते करते है और सार्थक समाधान मे सभी को सुनने समझने से परहेज करते है वह सर्बकल्याण मे कभी सफल नही रहते न ही उन्है कभी सराहा जाता जबकि सत्ताओ का धर्म होता है कि वह अपन सिपहसालार सलाहकार के अलावा उन लोगो को भी सुने उनकी बात समझने की कोसिश करे जो कुछ कहना करना चाहते है उन श्रेष्ठ सज्जन पुरूषो का तिरस्कार सियासी मसूबो के आगे कभी न करे जो सर्बकल्याण मे सार्थक सोच के साथ अपना योगदान अपने देश व देशवासियो के लिये करना चाहते है । मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था मे स्वयं के सियासी कुनवे मे श्रेष्ठजनो की खोज और सिस्टम पर अंधा विश्वास सर्बकल्याण या संकट के समय सबसे बड़ी बाधा साबित होता है । मगर यह सब भी क्राइसेस मैनेजमेंट की सलाह मशविरे के नाम चल रहा है । सेवा कल्याण के नाम आपस मे एक दूसरे की पीठ ठोक पुरूषकृत करने की संस्कृति ने कर्ताओ को इतना अंधा बना दिया है कि अब उनका सत्य कहने सुनने बालो से दूर दूर तक का वास्ता ही नही रहा बहरहाॅल सत्ताओ का यह गुणदोष कोई नई बात नही यह तो अनादिकाल से चलता चला आ रहा है । जो न तो जन न ही राष्ट्र्हित मे है यह हर उस राष्ट्र्भक्त को समझने बाली बात होनी चाहिए जिन्होने समुचा जीवन सिर्फ इस उम्मीद मे बैभाव गला दिया की एक दिन हमारा राष्ट्र् एक मर्तवा फिर से समृद्ध खुशहाॅल सामर्थशाली बनेगा और आज भी इसी उम्मीद मे वह दिन रात जुटे रहते है की कैसै सर्बकल्याण का कार्य सार्थकता से सम्पंन्न हो मगर दुर्भाग्य की आज भी न तो कोई शोध संसाधन , शील सप्लाई पर काम करना चाहता न ही इस महासंकट का कोई स्थाई समाधान खोजना चाहता सिर्फ खीचड़ उछाल प्रतिस्पर्धा को ही जारी रखना चाहते है जो दुर्भाग्य पूर्ण ही कहा जायेगा । जय स्वराज ।

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