श्रेष्ठतम समझ सार्थक साथियो के अभाव में अधभुत अवसर गवांती महात्वकांक्षाये और मौजूद पीढ़ी
सत्ताओ का शाही अंदाज संकुचित सोच , समृद्ध खुशहाॅल जीवन निर्माण मे बड़ी बाधा
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
महामारियो के महासंकट के बीच आज हम जिस मुकाम पर है वह खेदजनक ही कहा जायेगा कारण न तो सत्ता सक्षम नेतृत्व का लाभ उठा पा रही न ही नेतृत्व सत्ताओ के शाही अंदाज और संकुचित सोच के आगे मौजूद प्रचूर मानवीय संपदा का लाभ उठा मौजूद समस्याओ के समाधान तथा प्रत्याशित लक्ष्यो को पूरा करने उन श्रेष्ठ अवसरो का लाभ उठा अपने पुरूषार्थ सिद्ध कर पा रहा है । निश्चित ही देश बड़ा समस्या अनंत है मगर समाधान तो ढूढ़ना ही होगा जिसकी पूर्ति श्रेष्ठतम समझ व सार्थक सहयोगियो के बिना संभव नही है अफसोस तो यह है कि 7 बर्षो के श्रेष्ठतम समय मे बड़े अप्रत्याशित बदलाब तो हुये मगर वह सार्थक स्थाई परिणाम देने मे अक्षम असफल रहै जो सार्थक हो सकते थे एक से बढ़कर एक निर्णय मगर परिणामो के अभाव ने उन्है शून्य कर दिया सिवाय बाटने बटोरने इकटठा करने के इसका मतलब यह कतई नही कि निर्णय पूर्णतः अक्षम असफल हो गये मगर सत्ता के बाहर बैठे महाकांक्षी और मलाई काटू लोगो के लिये यह किसी को नीचा दिखाने का कारगार हथियार नही हो सकता है न ही यह हथियार सर्बकल्याण और समृद्धि और श्रेष्ठसमझ बालो के लिये घातक , क्योकि वह तो बैसै भी पुरूषार्थ के आगे न काफी साबित होते रहे है । और आज भी हो रहे है ।
निश्चित ही अन्तरराट्र्ीय स्तर पर , पड़ोसी दुश्मनो के साथ जो लम्बी लकीर खीची गयी वह किसी चमत्कार से कम नही और जिस तरह से फिल्म साॅसल मीडिया सहित सामाजिक सरोकारो मे बढ़ती गंदगी को कंट्र्ोल किया गया वह किसी से छिपा नही इसके अलावा अभाव के जीवन को सहारा तथा सामरिक क्षैत्र मे जो लम्बी छलांग लगाई उसकी सराहना के साथ मूल सिस्टम मे भ्रष्टाचार पर बंदिस के प्रमाणिक प्रमाण ने यह सिद्ध कर दिया कि काम हो रहा है मगर इसमे सिस्टम या और कोई अपनी पीठ थपथापाये तो वह ऐसा कर सकता है मगर यह सच नही क्योकि यह सब उस संकल्प शक्ति का त्याग प्रमाण है जिसने यहां तक पहुॅचने के लिये बड़ी तपस्या की है और आज जो चहुॅओर से असफलता के प्रहारो का शिकार है और यह होना भी चाहिए मगर श्रेष्ठतम संस्कारो के सभ्य भाषा के साथ और इससे उस नेतृत्व को भी बिचलित नही होना चाहिए जिसका लक्ष्य सिर्फ राष्ट्र् कल्याण है मगर कहते है शासक को सिस्टम पर भी इतना निर्भर नही होना चाहिए कि उसके सार्थक कार्य जीवन कल्याण मे निर्थक सिद्ध होने लगे आजू बाजू ऐसा शाही अंदाज भी नही होना चाहिए कि कोई श्रेष्ठ जन अपनी बात भी उनके बगैर न रख सके अर्थात जिस कारण से सियासत मे हाल ही मे बर्षो पुराना वट वृक्ष तार तार होतो नजर आ रहा है उसके मूल मे भी यही समस्या मुख्य रही । परिणाम मूलक टीम के अभाव मे असफलता का दंश इतना गहरा नही हो सकता की उसमे सुधार न हो सके । बस एक कोसिश तो की ही जा सकती है फिर वह कोई व्यक्ति या संगठन उसे त्यागना होगा सकुचित भाव और श्रेष्ठजनो की अनदेखी मगर ऐसा होगा यह संभव नही क्योकि मीनार की उचाई पर बैठ वह श्रेष्ठ देख पाते है जिनका भाव कल्याण का होता है इसलिये मौजूद नेतृत्व के लिये यह कोई बढ़ी बात नही यह संभव है । शायद ऐसा अवसर ईश्वर दे या न दे जो आज है इसलिये एक कोसिश तो अवश्य होनी चाहिए । राष्ट्र् व राष्ट्र्जनो को आज बढ़ी उम्मीद है अपने श्रेष्ठजनो से जय स्वराज ।

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