तप तमश के संघर्ष में बैहाल समृद्ध जीवन


पुरूषार्थ से बांझ सामर्थ , समझ के अभाव हुआ अनाथ 

अगर स्व कल्याण के आगे , सर्बकल्याण का भाव सुरक्षित नही रहा , तो उन लोगो का भी जीवन समृद्ध खुशहाॅल नही रह पायेगा , जो आज कर्तव्य बिमुख हो स्वयं को भगवान समझ स्वकल्याण मे जुटे है । 

व्ही. एस. भुल्ले 

विलेज टाइम्स समाचार सेवा म. प्र. 


अगर यो कहै कि समुची सृष्ट्र् िमे सुर असुर , सात्विक तामस्कि , तप तमश , शाकाहारी मांसाहारी प्रवर्तियो का समय वे समय बोलबाला रहा है । फिर वह छड़िक हो या फिर दीर्घकालिग रहा हो इतिहास गवाह है । कि कभी किसी ने नैसर्गिक स्वभाव बस किसी की नही मानी परिणाम संघर्षो से सना जीवन मगर इतिहास हमे बताता है कि श्रेष्ठता हमेशा तप और सर्बकल्याण की रही है भले ही स्व कल्याण कितना ही पुरूषार्थी सामर्थय शाली क्यो न रहा हो वह कभी श्रेष्ठता हासिल नही कर सका और स्वयं भू काल्पनिक श्रेष्ठता को ही सर्बोपरि मान स्वयं को श्रेष्ठ निरूपित करता रहा समझाया तो मन्दोदरी ने रावण को कैकसी ने कंस को और कृष्ण ने धृतराष्ट्र् को भी था मगर क्या हुआ तीनो ऐश्वर्य सामर्थ स्व कल्याण के धराशायी हुआ । और आज भी हम ऐसा ही कुछ देखते आ रहै है । जब केन्द्र राज्यो की सत्ता मे काॅग्रेस , बन्धन गठबंधन या फिर भाजपा ,सपा ,बसपा, डी एम के ,ए आई डी एम के , तृणमूल , राजद , शिवसेना , किसी की भी औपचारिक अनौपचाकि तौर पर रही हो या हो मगर वह स्व के मोह से सत्ता को बचाने मे अक्षम असफल सिद्ध होते रहै है । कारण सर्बकल्याण से इतर स्व कल्याण भाव से समझौता अब इसके पीछे की बैबसी तो वही जाने मगर परिणाम की आज समृद्ध खुशहाॅल जीवन देने मे एक भी सिद्ध नही हो सके । काश हमने पेड़ पौधे , जीव जन्तु , पशु पक्षी , जानवरो से ही कुछ सीखा होता तो ये दिन मानव जीवन को न देखने पड़ते जिस तरह से आज सही समझ के आभाव मे पुरूषार्थ सामर्थ बांझ नजर आता है वह व्यवस्था नही बल्कि व्यतिगत महात्वकांक्षाओ की कीमत पर हुई वह कुर्बानियां है जो आज भी अनवरत जारी है जो स्पष्ट तौर पर तामसी प्रवृति का धोतक है । कहते है सर्बकल्याण मे सज्जन , श्रेष्ठजन , सामर्थशाली , पुरूषार्थी लोगो से मानव धर्म रक्षा और समृद्ध खुशहाॅल जीवन को बड़ी उम्मीद होती है मगर व्यवहारिक दृष्टि से आज जीवन निराश है जो नही होना चाहिए अब तो जो संस्कृति धीरे धीरे मानव जीवन पर हावी हो चली है उसने तो माने उम्मीद की अन्तिम किरण से मेहरूम कर दिया है जब समुचा जन मानस आज मानवीय कृतज्ञता को लेकर निराश है ऐसे मे सर्बकल्याण मे आस्था रखने बाले हर उस मानव को अवश्य विचार करना चाहिए कि श्रेष्ठ क्या है और किस लिये हम मानव जीवन मे है हमारे क्या दायित्व कर्तव्य है । आज यही समझने बाली बात सभी के लिये होना चाहिए । जय स्वराज । 

  

 

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