विश्वास से घात , संस्कृति , सभ्यता ,नैतिकता का नाश
जीवन में स्वीकार्य व्यवहार के बिरूद्ध आचरण घातक
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
31मई 2021 शिवपुरी म.प्र. भारत - अध्ययन , ज्ञान , विज्ञान के संधर्ष में तार तार मानवता कहां जाकर रूकेगी यह कहना फिलहाॅल मानव जीवन की जल्दबाजी होगी जो न्यायोचित नही ठहराई जा सकती मगर यह सच है कि इस संघर्ष मे जिस तरह से विश्वास के नाम मानवीय सरोकारो से घात हो रहा है उससे उस महान संस्कृति , सभ्यता , नैतिकता का नाश होना तय जान पढ़ता है जो मानवीय सभ्यता ही नही समस्त जीवनो के जीवन का आधार है दुर्भाग्य इस मानव जीवन का यह है कि जो सक्षम है जिनको सामर्थ पुरूषार्थ प्राप्त है वह सिर्फ इस डर से कुछ करना नही चाहते कि कही उनका यह एश्वर्य न डूब जाये इस सर्बकल्याण के मार्ग पर जिसे वह जीवनपर्यन्त अक्षुण रखना चाहते है और न जाने कौनसा इतिहास गढ़ उसे सुनहरे अक्षरो मे जड़बाना चाहते है समस्त मानव जीव जगत और इस सुन्दर कायानात की कीमत पर यह तो वही बैहतर बता सकते है ं। मगर इस सब इतर यह आज जो मानवीय व्यवहार मानव जीवन मे परिलक्षित हो रहा है वह कही से भी स्वीकार्य व्यवहार के पक्ष मे नही यह सही है कि मानव जीवन मे सामाजिक पर्यावरण अनुकूल ढलना या उसे नकार स्वयं की विद्यिवत्ता सामर्थ अनुसार एक ऐसी व्यवस्था कायम करना जिससे अन्तिम लक्ष्य मानव सहित सर्बकल्याण हो मगर व्यवस्था से सहमति असहमति हो सकती है उसके निदान के तरीके भी स्थापित या नये हो सकते है लेकिन अगर वह मौजूद जीवन को समृद्ध खुशहाॅल बनाने मे सक्षम सफल नही है तो अब शायद कोई भी मानवीय जीवन छोड़ जीवजगत को भबिष्य मे नही जीना चाहता बल्कि समृद्ध भबिष्य की तैयारी भी वह येन केन प्राकेण बर्तमान मे ही कर लेना चाहता है जिसके लिये वह संस्कार , सभ्यता , नैतिकता को भी तार तार करने मे कोई गुरेज नही करना चाहता यह आज का सत्य कहा जा सकता है मगर यह भी सम्पूर्ण सत्य नही । क्योकि अब भ्रमित मानव जीवन का सही मार्गदर्शन करने के बजाये स्वकल्याण शोषण की संस्कृति मानव जीवन मे हावी हो चुकी है । अब ऐसे कोरोना प्रकृति जनित महामारी है या मानव जनित बीमारी यह वहस का बिषय हो सकता है मगर यह भी अकाटय सत्य है कि इस बीमारी ने समुचे विश्व मे लाखो लोगो की जान हमारे देखते देखते ली है । और हमारा घोर अध्ययन , ज्ञान , विज्ञान उन लोगो का जीवन नही बचा सका जो हमारे अपने या हमारे ही बीच के थे । जमीन से लेकर पाताल आसमान तक पहुॅच बनाने बाले हम कुछ नही कर सके और बैबसो की भांती लोगो को मरता बिलखता देखते रहै जो किसी भी मानव जीवन के अस्तित्ब ही उसके सामर्थ पर सीधा सबाल है । यह तर्क कतई उचित नही कहा जा सकता की मानव जीवन होता ही प्रकृति बिरूद्ध पुरूषार्थ के लिये ही अस्तित्व मे है । बल्कि सच यह है कि मानव जीवन ही सृष्टि मे वह जीवन है जो प्रकृति से सीख कर ही अपने अध्ययन ,ज्ञान , विज्ञान को मानव जीवन को सर्बकल्याण मे पारांगत बना समस्त जीव जगत के जीवन को संरक्षित कर उसे समृद्ध खुशहाॅल बनाने का कार्य करे । जिससे मानव जीवन की सिद्धता हर युग काल परिस्थिति मे होती रहै और वह मानव के रूप मे अपने जीवन की सिद्धता सिद्ध कर सुनहरा इतिहास छोड़े जिस पर आने बाली पीढ़ियां गर्व कर स्वयं को मानव होने नाते स्वयं को गौरान्वित मेहसूस कर सके । मगर यह फिलहाॅल संभव न हो क्योकि सभी के अपने तरीके है और अध्ययन , ज्ञान , विज्ञान मगर उम्मीद तो की ही जा सकती है । मगर जब तक कर्ता विश्वास की ध्वजा उठा घातियो पर विजय प्राप्त नही कर लेते तब तक सारे प्रयास पुरूषार्थ की पराकाष्ठा अधूरी रहने बाली है । जय स्वराज ।

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