त्याग की साख पर कलंक , निष्ठा बनी बड़ी बाधा


नही दे सके सिपहसालार सार्थक परिणाम 

फिर से मुश्किल मे महान देश 

व्ही. एस. भुल्ले 

विलेज टाइम्स समाचार सेवा 


जरा सी चूक मे काबू कोरोना ने जिस तरह से देश मे कहर बरपा रखा है इसकी जबाबदेही से बचना उतना ही मुश्किल है जितना आज कोरोना के कहर से आम जीवन का अब यह बीमारी क्या है या आने बाली बीमारियाॅ क्या होगी इसके मूल कारण क्या है यह अलग बात है मगर फिलहाॅल पैर पसार चुका कोरोना या उसके आगे की बीमारियाॅ क्या होगी यह भी चर्चा का बिषय हो सकता है मगर इतना तो तय है कि कोरोना को भी आज नही तो कल इस महान देश से जाना ही होगा और आने बाली अन्य बीमारियो के प्रति सचेत हो आगे के कदमो को उठाना होगा । 

मगर सबसे बड़ी बाॅधा तो यह है कि यह होगा कैसै करेगा कौन अभी तक जो हुआ या राष्ट्र्हित किया गया मानो सबका सब पानी मे जाता दिखाई पढ़ता है फिर वह स्वच्छता से लेकर जनधन , बीमा , मुद्राकोष , ग्रीन इण्डिया , स्र्टाटव , मैकइन इण्डिया , जल जीवन मिशन , प्रधानमंत्री आवास , प्रधानमंत्री सड़क , फाॅर लैन इण्डिया , आतंक खून खराबा मुक्त इण्डिया , सुरक्षित इण्डिया , शसक्त इण्डिया , शिक्षित इण्डिया , समृद्ध इण्डिया , आयुषमान , उज्जबला , नाॅटबन्दी , जी.एस.टी. , अन्तरराष्ट्र्ीय संबध कई स्तरो पर सार्थक प्रयासो की कोसिश हुई जिसमे ढंके की चोट पर सिर्फ एक सफलता को कहा जा सकता है कि केन्द्र सरकार के एक भी सदस्य पर सबसे बड़ी दीमक भ्रष्टाचार से ग्रसित नही पाया । रहा सबाल राफेल का तो उस पर भी भले ही सबाल रहै हो मगर राष्ट्र्हित से कोई समझौता नही हुआ यह भी गर्व से कहा जा सकता है । 

इसके अलाबा जो भी रहा उसमे नीति नियोक्ताओ को दर किनार कर दे तो यह उन सिपहसालारो का काम था जिसके लिये वह सत्ता मे अस्तित्व मे रहै या है वह केन्द्रीय स्तर के भी हो सकते है और संघीय ढांचे की बाध्यता अनुसार राज्य स्तर के भी हो सकते है । जो दल गत विरोधि थे उनसे से उम्मीद ही बैमानी हो जाती है अगर एक दो को छोड़ दे तो शेष इतना भी नही कर सके जो उनसे अपेक्षित था अब ऐसे मे अगर सबाल हो रहै है तो हर्ज ही क्या लोकतांत्रिक व्यवस्था मे सबाल होना तो स्वाभाविक है और को जिन्दा रखना है तो सबाल होते भी रहना चाहिए । मगर स्वार्थ के लिये सबाल सर्बकल्याण के नाम हो तो ऐसे सबालो की परवाह भी नही की जानी चाहिए फिर वह कितने ही सार्थक क्यो न हो उनका समाधान अवश्य तलाशा जाना चाहिए । मगर इससे बड़ी बाधा जो रही की जो सामने मानव संसाधन थे अगर वह सक्षम सफल व्यवस्था अनुसार नही थे तो हम उसका विकल्प नही ढूढ़ पाये और अनुवांशिक निष्ठा के आगे हम व्यापक नही सोच पाये न ही उस जबाबदेही से उन राष्ट्र् भक्तो को जोड़ पाये जो राष्ट्र्कल्याण मे सार्थक हो सकते थे वह भी अपना अमूल्य योगदान राष्ट्र्निर्माण मे दे सकते थे कहते बौद्धिक संपदा का भी अपना एक नैसर्गिक स्वभाव होता है और वह स्वार्थवत अवसर से इतर स्वभिमानी आग्रह चाहते है मगर निष्ठावत मोह या मजबूरी ने ऐसा होने नही दिया अगर हमारी इतिहास मे तनिक सी भी आस्था विश्वास है तो वह शासक सफल और सम्राट बने जो मानव संसाधन प्राक्रतिक संसाधनो के साथ बौद्धिक संपदा से समन्वय बैठाने मे सफल रहै और उस संपदा को संरक्षित कर उसके नैसर्गिक स्वभाव अनुसार उन्है उनकी योग्यता अनुसार सम्मानित कर राज्य और राष्ट्र्कल्याण मे जुटे रहै । कहते नौकरो का मोहताज चापलूसो से घिरा स्वयं के अपनो मे योग्यता तलाशने बाला राजा कभी सफल नही रहता एक न एक दिन उसे अवश्य उस कृत्य का भागीदार सिद्ध होना होता है जो उसने किया ही नही । स्वराज का नाम त्याग जिन जिन भी सर्बकल्याण मे सिद्ध होने की कोसिश की वह अक्षम असफल ही सिद्ध हुये मगर दुख और अफसोस तो इस बात का है कि एक लम्बी त्याग तपस्या पश्चात एक ऐसा नेतृत्व इस महान राष्ट्र् को मिला जिससे देश को बड़ी उम्मीदे है जो सक्षम जिसकी निष्ठा पर संदेह सूर्य को आयना दिखाने जैसा है मगर उससे कहै कौन और वह सुने कौन जो देश कहना चाहता है देश बड़ा है जबाबदेही बड़ी है दायित्व बड़ा है अभी तो ठीक से शुरूआत भी नही हुई और उससे पहले ही अधंकार छाने की तैयारी सामर्थ कर रहा है निराश है वह तवका जिसे बर्षो बाद गर्व गौरब की अनुभूति मेहसूस हुई मगर क्या पता था कि एक कोरोना कुनबे की कर्तव्यविमुखता के चलते इतना बड़ा कलंक लगा देगा । अभी भी बहुत कुछ नही बिगड़ा सुधार हो सकता है मगर सिस्टम सहारे बहुत कुछ नही होने बाला सिस्टम तो सिर्फ इतना ही कर सकता है जो वह आजतक कर सका और जो उसे उस शिक्षा प्रशिक्षण से मिला जो इन 70 बर्षो मे उसे प्राप्त है सिस्टम सिर्फ सिस्टम होतो है समाधान नही जब तक सिस्टम मे समाधान प्रवाहित नही होगा कैसै सम्भव है समाधान इसलिये आॅख कान खोल कर तलाशने होने वह लोग समधान के साथ भविष्य की संभावनाओ का भी ज्ञान रखते बनाना होगा सूचकांक जिंदा करनी होगी साख्की जिससे बर्तमान और भबिष्य का आकंलन गणितीय पद्धति से किया जा सके क्योकि खतरा देश अकेले कोरोना से नही न जाने कितने घायल कोरोना इस राजनीत सियासत न जाने किस किस क्षैत्र मे घूम रहै जो कोरोना भी अधिक घातक है जरूरत कोरोना पर लगाम लगाने के साथ एक बैहतर टीम बनाने की भी है जो कोरोना सहित अन्य संकटो का पूर्व आकलंन कर देश को कलंकित करने बाले उन तत्वो से बचाया जा सके जिससे आज देश आतंकित ही नही भयग्रस्त है फिर वह कोरोना ही क्यो न हो क्योकि साख बचाने का यह 21बी सदी का पहला और अन्तिम अवसर भी हो सकता है आज हर राष्ट्र्भक्त को मानव धर्म मे आस्था रखने बाले को समझने बाली बात होना चाहिए हमारा नेतृत्व मजबूत है सक्षम है निर्णायक है जरूरत सिर्फ सभी के सहयोग और मानव धर्म राष्ट्र्धर्म रक्षा की है । जय स्वराज । 


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