बड़े सूबे मे बड़ी उठापटक , तैबर हुये धरासायी यही सियासी बैबसी ने किया है , सियासत का बंटाढार
वीरेन्द्र शर्मा
14 जून 2021 - आज यहां हम बात कर रहे हे देश के सबसे बड़े सूबे उ.प्र. की जहां सियासी उठापटक का खेल खुलयाम चल रहा है ये सही है कि कुछ दिनो पहले तक जिस तरह से सत्ता के तैबर परवान चढ़े निश्चित ही उसमे सर्बकल्याण छिपा था मगर अब जिस तरह से तेबर ढीले हुये है उसमे किस किस का कल्याण छिपा है यह तो 2022 के चुनाव परिणाम ही तय करेगे । मगर जहां तक सत्ता स्वभाव की बात है तो जिस तरह सत्ताओ मे सम्राज्य बढ़ने की चाहत और जो तौर तरकीव रही है आज की सियासत भले ही उससे जुदा हो मगर जो शासक अपना अपना सम्राज्य बढ़ने मे कामयाब रहै अनुभव बताता है कि तरीका स्वीकार्य और सर्बकल्याण का वह भाव ही रहा जिस पर छोटे छोटे शासको सहमति या फिर सत्ता के आगे की बैबसी रही हो चूकि तब राजतंत्र हुआ करते थे और राजा का हुकूम हर प्रजा के सरमाथे मगर व्यवस्था लोकतांत्रिक है जनतंत्र है और जनता के वोट निर्धारण करते है कि शासक कौन होगा और जनअकांक्षाओ की पूर्ति सहित शासन कौन करेगा । शायद इसलिये ही संबिधान निर्माताओ ने केन्द्र और राज्य सरकारो की व्यवस्था की और उनके क्या क्या अधिकार होगे इसकी व्यवस्था की मगर सर्बकल्याण के नाम सत्ता उन्मुखी सियासी संघर्ष यह सिद्ध करता है कि अब उसका अन्तिम लक्ष्य ही सतत सत्ता मे बने रह गया है न की सर्बकल्याण वरना इतने बड़े सूबे मे ऐसा क्या हुआ जो चुनावो के पूर्व यह सुर्खिया बनने लगी की उ.प्र. की सत्ता सियासत मे सब कुछ ठीक नही चल रहा जो चल रहा है वह तो विगत 2-3 बर्षो से चल रहा है उसमे नया क्या है अगर वह सब कुछ गलत था तो अभी तक ऐसा चलने ही क्यो दिया गया और ठीक था तो फिर इस तरह की सियासी रायसुमारी क्यो ? कौन नही जानता की अब व्यक्ति ही नही , समूह , समाज , संगठन के अपने अपने ऐजन्डे है जिनके बल वह सत्ता सिंहासन तक पहुॅचते है । अगर सत्ता तक पहुॅचने का यही फाॅरमूला है तो फिर सर्बकल्याण कहां रह जाता है , अगर संघर्ष ही बर्तमान को दांव पर लगा समृद्ध भबिष्य की सीढ़ी है जो काल्पिनिक है तो फिर जीवन के मायने कहां बचे यह आज हर नागरिक और सियासत दान को समझने बाली बात होना चाहिए । क्योकि विगत कुछ बर्षो से जिस तरह से उ.प्र. का निजाम चला है निश्चित ही वह समय की दरकार हो सकती है और उसके परिणाम उसकी कृतज्ञता तो फिर आकलन होने दो जिस जनता का यह लोकतंत्र मे राज होता है उसे फैसले लेने दो मगर लोकतंत्र की कड़बी सच्चाई से सभी बाकिफ है जो नही चाहते की कोई चूक हो मगर इससे भी बैहतर तरीके ओर हो सकते है मगर संघर्ष कौन करे क्योकि अब लोकतंत्र के मायने ही आया राम गया राम रह गया और सर्बकल्याण के मायने स्वकल्याण तो फिर ऐसे मे किसे पढ़ी जो रिस्क ले बैसै उन प्रबन्धको को याद रखना चाहिए जो स्वयं को सियासी उस्ताद समझते है कि इस लोकतंत्र ने बडे बडे़ प्रबन्धन को चिता सुलगते देखी है एक से बढ़कर एक महाबली के जनाजे देखे है मगर अब उनका कही से कही तक नामो निशान नही तो कुछ आज भी अपनी झूठी शान बचाने हाड़तोड़ संघर्ष मे जुटे जिसमे उ.प्र. का तो कही से कही तक नाम ही नही अगर हम बात करे म.प्र. के एक बड़े प्रबन्घक कि जिन्है सार्वजनिक जीवन मे सुनना तो दूर देखना तक पसंद नही करते तो वही पश्चिम बंगाल का उदाहरण सामने है और जो आज जोड़तोड़ के सहारे वैचारिक आधार की लाश पर बैठ सत्ता सुख भोग रहै उनका भी भबिष्य कोई सुनहरा नही रहने बाला क्योकि मानव जीवन आज भी अब संघर्षरत नही पीढ़ा ग्रस्त है अभावग्रस्त है ऐसे लोगो की मौजूद पीढ़ी या आने बाली पीढ़िया न तो ऐसी कृतज्ञता को सराहने बाली है न ही स्वीकार करने बाली है क्योकि स्वयं का जीवन तो कोई भी जी लेता है मगर जो ओरो के कल्याण मे जीवन को सिद्ध करते है अपनी कृतज्ञता से उन्है मौजूद लोग तो याद करते ही है बल्कि वह अपनी आने बाली पीढ़ियो तक यह संदेश छोड़ते है कि जीवन का सत्य क्या है और महान कृतज्ञता किसे कहते है जिसका अनुसरण कर आने बाली कौमे आगे बढ़ती है जिनका पहला और अन्तिम लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ सर्बकल्याण और सेवा भाव ही होता है । मगर लगता नही की मौजूद व्यवस्था मे ऐसा संभव हो सकेगा क्योकि तार तार जीवन सरोकार और महात्वकांक्षाये इसकी इजाजत ही कहा देती है लेकिन अगर मानव अपना सार्वजनिक जीवन लोक कल्याण को समर्पित कर निष्ठापूर्ण अपने कर्तव्यो का निर्वहन करता है वह भी इस अपेक्षा के साथ कि उसे तो सिर्फ और सिर्फ सृष्टि सजृन मे मानव जीवन की उपायदेयता सिद्ध करना है न कि सतत सत्ता , और संसाधनो का संग्रहण करना है तो मानव जीवन की प्रमाणिक स्वीकार्य सिद्धि संम्भव है । जैसा पहले भी होता रहा है । और भबिष्य मे भी संभव है ।

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