अघोषित सम्राजवाद से संघर्ष करते , जीवन सरोकार पुरूषार्थ विहीन श्रेष्ठता सामर्थ हुआ तार तार
सेवा ,शिक्षा , स्वास्थ ,पशुधन , के बाद अब रोजगार का समाचार लज्जाजनक
वीरेन्द्र शर्मा
16 जून 2021 - अगर यो कहै कि आजाद भारत सत्ता सौपानो से निकलने बाली खबरे नये नये कीर्तिमान स्थापित कर अनोखा इतिहास रच स्वयं को धन्य सिद्ध करने के कुचक्र मे फस चुकी है तो कोई अतिसंयोक्ति किसी को शायद नही होनी चाहिए क्योकि जमाना ही कुछ ऐसा है क्योकि सेवा कल्याण की मिटटी पर जिस तरह से कफन दफन की संस्कृति हाॅवी हो चुकी है उसे 21 बी सदी के अगर श्रेष्ठतम प्रबन्धनो मे से एक प्रबन्धन घोषित किया जाये तो यही सत्ता सौपानो की सबसे बढ़ी उपलब्धि आने बाले भबिष्य मे कही जायेगी । कारण लोककल्याण के नाम सम्राज्यवादी आचार व्यवहार की जीवन सरोकारो के बीच स्वीकार्यता और श्रेष्ठजन सामर्थशालियो का पुरूषार्थ विहीन सामर्थ अब यह उनकी बैबसी भी हो सकती है या फिर जनधन के करोड़ो अरबो उलीच लोकतांत्रिक व्यवस्था की कमजोरी का लाभ उठा भोले भाले बैबस अभाव ग्रस्त लोगो के सामने स्वयं को सबसे बड़ा सेवक सिद्ध करने का हाईटैक प्रबंधन हो जिसके मूल धार के प्रवाह मे क्या संस्कृति , संस्कार , जीवन सरोकार सपने सभी दम तोड़ते नजर आते है सत्ताओ के लज्जाविहीन इस आचरण पर आज भले ही किसी को अफसोस न हो मगर सूचना क्रान्ति के दौर मे जो नई सोच संस्कृति ,संस्कार जन्म ले रहै है वह बड़े ही डराने बाले है । क्योकि जन सेवा कल्याण के नाम जो हटो बचो की नीति या यो कहै कि जिस अलाउददीन के चिराग के आगे सभी चारो खाने चित नजर आ रहै असल मे ऐसा कुछ भी नही बस अभावग्रस्त बैबस लोगो को इन्तजार है समय का जैसा कि आज तक होता आया है । बड़े बड़े सम्राज्य सूवा जब धरासायी हुये तो उनकी चर्चा करने बाले भी न तो इतिहास न ही आज ढूढ़े मिलते है मगर कहते अहंकार को अकल और अत्याचारियो को कीर्ति भाग्य से ही नही होती सो इसकी उम्मीद करना की ऐसे लोगो बीच राष्ट्र् जन का कल्याण भला होगा जीवन का सबसे बड़ा झूठ तो हो सकता है मगर सत्य कदाचित नही । यहां हम बात कर रहै है म.प्र. की जहां एक अहंकार तो पहले ही श्राप सिद्ध भोग रहा है दूसरा अहंकार किस श्राफ का शिकार होगा फिलहाॅल भबिष्य के गर्भ मे है मगर अब यह तय है कि वह समय भी अब बहुत दूर नही क्योकि इस सृष्टि मे पाने या अभावग्रस्त रहने बाले का अपना प्रारब्ध होता है उसकी अपनी अदृश्य दण्डविधि होती हे जिसका आभास भी सिर्फ उसे ही होता है जो उसका पात्र होता है अस और अपयस उसके कर्तव्य निर्वहन के परिणाम होते है सो अफसोस मनाने के बजाये उसे सहर्ष अंगीकार करना चाहिए निश्चित ही यह सेवा कल्याण का तिलिस्म भी टूटेगा और पात्र पुरूषार्थियो को पारितोष भी प्राप्त होगा क्योकि जीवन सृजन कल्याण मे आस्था रखने बालो को यह नही भूलना चाहिए कि जो आज है निश्चित ही वह कल नही रहेगा फिर वह यश कीर्ति हो या अपयश आज हर निराश व्यक्ति को यह समझने बाली बात होना चाहिए ।

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