बांटने डाटने के खेल में जमीर खोती जमुहरियत


बर्तमान भबिष्य पर समृद्ध जीवन का संकट 

व्ही. एस. भुल्ले 

27 जून 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


सेवा के नाम हासिल समृद्धि पर धन बल के सहारे जमुहरियत मे कोई स्वयं को कितना ही बड़ा सम्राट , सिद्ध पुरूष क्यो न साबित कर ले मगर ऐसे लोगो का इतिहास गबाह है कि सच मायने मे आज न तो उनका कोई इतिहास है न ही उनका भबिष्य मगर लोग है कि आज भी परिणामो से कोई सीख लेने तैयार नही जिस तरह से सत्ता सियासत के खेल मे जमीर नीलाम होता है सेवा कल्याण विश्वास के नाम ऐसा नही उस खेल से आज जनता परिचित न हो वह सब जानती है और आज सत्ताये सियासत भी आम लोगो की बैबसी मजबूरी को बखूवी समझती है । मगर जो नाश आज जमुहरियत का देखा जा रहा है वह बड़ा ही शर्मनाक है । अगर हम बात म.प्र. की ही करे तो म.प्र. विगत 17-18 बर्षो से एक ही सत्ता है मगर समृद्ध जीवन के नाम उपलव्धि शून्य इसमे कोई शक नही कि आज अपन बर्तमान भबिष्य को लेकर तीन पीढ़िया कतार मे चिन्तित है मगर उनके सामने कोई ऐसा समाधान मौजूद नही जिस पर गर्व कर स्वयं गौरान्वित मेहसूस कर सके यू तो विधान अनुसार 5 बर्ष का समय किसी भी सिद्धि मे बहुत होता है मगर डाटने बांटने का खेल ऐसा चला कि अब तो समृद्धि खुशहाॅली ही स्वयं सबाल बन गयी है । बहरहाॅल फिलहाॅल तो यही कहा जा सकता है कि कम्पियुटर गुरू की गुलाम जमुहरियत और नैट गुरू की गुलाम नई नस्ल आमफट के इन्तजार मे है क्योकि आज जब बगैर नैट के जनता तो बगैर कम्पियुटर के जमुहरियत चलने तैयार नही तो कैसै विधि का विधान बचेगा और कैसै नैसर्गिक न्याय का सिद्धान्त यही आज सभी को समझने बाली बात होना चाहिए । कहते इतिहास रचने बाले न तो घिसटते है न ही समय का इन्तजार करते है वह तो सिर्फ और सिर्फ पुरूषार्थ करते है जिसके परिणाम भी सफल होते है और वह उस सामर्थ पुरूषार्थ के साक्षी भी बनते है । शायद सेवा कल्याण मे डूबे इस सच को समझ पाये वरना कहते है समय , समय होता है उसने कभी किसी का इन्तजार नही किया फिर वह मानव जीवन का प्रारव्ध हो बर्तमान उस जीवन का कर्म अनुसार न्याय अवश्य किया है । इसे हम अध्यात्म कहकर नकार भी सकते है सत्य मानकर स्वीकार भी सकते है मगर तब तक बहुत देर हो चुकी होती है । यही मानव जीवन का यथार्त भी है जो मानव जीवन को कल्याण के प्रति बाघ्य भी करता है और जीवन मे स्वयं की कृतज्ञता सिद्ध करने का मौका भी देता है । जय स्वराज । 


 

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