पुरूषार्थ के अभाव मे कलंकित होता सामर्थ
मुख्यमंत्री की चिन्ता व्यर्थ नही , परिणाम पारदर्शी स्पर्शी हो
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
म.प्र. - कोरोना के कहर से व्यथित म.प्र. के मुख्यमंत्री की चिन्ता व्यर्थ नही क्योकि अपने आलाअधिकारियो की समीक्षा बैठक मे वह स्वयं यह स्वीकार चुके है कि दूसरी कोरोना लहर के शुरूआती कहर को देख वह कई राते चैन से नही सो सके इसलिये किसी भी स्थति मे कोई भी कोताही नही होना चाहिए यह सच है कंगाल खजाने पर जिस तरह से उन्होने संसाधनो की कमी न होने देने का जो बीड़ा उठाया वह भी स्पर्शी ही कहा जायेगा क्योकि पूरे कोरोना कहर के बीच संसाधन जुटाने उन्होने धन की कमी आढ़े नही आने दी जिसे सराहनीय कहा जा सकता है मगर दर्द की बात यह रही की वह चाह कर भी कोरोना का शिकार हुये कई लोगो की जिन्दगी नही बचा सके कोरोना से तो जैसै तैसै कई लोगो अपनी अपनी जान बचाने मे सफल हो गये मगर अब ब्लेक फंगस ने लोगो के जीवन को संकट मे डाल रखा है । जो निश्चित ही एक बड़ी चिन्ता का विषय है अगर दूसरे शब्दो मे कहै तो जिस सामर्थ के साथ मुख्यमंत्री ने जीवन रक्षा का अभियान कोरोना से बचाव का अभियान छेड़ा वह मातहतो के प्रभावी पुरूषार्थ के अभाव मे वह परिणाम नही दे सका जिसकी की इतने संसाधन होने के बाबजूद उम्मीद थी ये अलग बात है कि फिर भी संक्रमण कम होने पर मुख्यमंत्री ने अपनी कैबीनेट की बैठक मे अपने सहयोगी मंत्री अधिकारियो की धन्यबाद के साथ हौसला अफजाई की और संभावित तीसरी लहर के चलते ऐलर्ट मोड पर रहने के निर्देश मातहतो को दिये । ऐसा मे इसलिये भी कह रहा हुॅ कि निश्चित ही मुख्यमंत्री एक नेकदिल इन्सान है भले ही वह एक सजग सियासी व्यक्ति हो मगर जिस तरह की ललक उनमे आम गरीब की मदद करने की रहती है वह परवान नही चढ़ पाती धन भी बैजा बर्बाद होता है और समय भी खराब मगर मातहतो से अलग चाह कर भी एक व्यक्ति कर भी क्या सकता है । फिर अन्दर से लेकर बाहर तक सियासी अदावत और सहयोगियो को साथ लेकर चलने की बैबसी से सियासी गलियारो मे कौन बाकिफ नही खासकर एक ऐसे संगठन के साथ जहां वैचारिक आधार सर्बोपरि रहता है । बहरहाॅल जरूरत आज इस बात की है कि मुख्यमंत्री एक बार अवश्य यह समीक्षा करे कि सत्ता के इन 15 बर्षो मे क्या खोया क्या पाया और ऐसा वह क्या नही कर सके जो उन्है करना चाहिए था जो समुचे जनमानस की पहली जरूरत थी या है । क्योकि सत्ता सरकार के मुखिया बतौर 15 बर्ष का समय बहुत होता है अगर आज भी वही चूक उन्होने की तो निश्चित ही जीवन का सत्ता उन्मुख सामर्थ तो आने बाले भबिष्य मे जाना जायेगा मगर लोग याद कर बर्षो बर्ष उस जीवन कृतज्ञता को सराहे ऐसा नही हो पायेगा क्योकि सत्ता तो बैसै भी आनी जानी चीज है जिसने समय और सत्ता का सर्बकल्याण मे सार्थक उपयोग किया उन्है मानव जीवन का इतिहास आज भी सराहता है उस कृतज्ञता को याद कर अपनी आने बाली पीढ़ी को गर्व गौरव से सुनाता है और यही मानव जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता सिद्ध रहती है इतिहास गबाह है । जय स्वराज ।

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