बांझ विधवा पुरूषार्थ की जड़ मे फलित भ्रष्टाचार
पहचान खोती संस्थाये , निषफल होता सामर्थ
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
कहते है सामर्थ कितना ही बड़ा प्रभावी क्यो न हो अगर उसे बांझ विधवा पुरूषार्थ का सानिग्ध प्राप्त हो जाये वह भी फलित भ्रष्टाचार के रहते निषफल हो जाता है इतना ही नही वह स्थापित संस्थाओ के आगे भी उनकी पहचान का संकट खड़ा करने मे सक्षम सिद्ध होता है । अब ऐसे मे कैसै हो सेवा और कैसै हो सर्बकल्याण अपने आप मे स्वयं एक सबाल बन जाता है मगर यह सच है कि ऐसा ही हो रहा है और अभी तक सत्ता सौपानो मे इसका बजूद कायम है । ये अलग बात है कि अब भ्रटाचान न तो समाच संस्था सत्ताओ मे कोई विषय रहा न ही उसकी चर्चा के कोई मायने रहै क्योकि फलित भ्रटाचार पर प्रभावी नकेल का अभाव इस बात का प्रमाण है कि जीवन मे भ्रटाचार कोई बिषय ही नही । क्योकि अब न तो सत्ता के अन्दर भ्रटाचार मापने को कोई यंत्र है न ही संस्थाओ मे होने बाली अनियमितताओ पर प्रभावी अकुश लगाने बाला कोई सिस्टम जो यह सिद्ध कर सके कि आम जीवन मे भ्रटाचार का कोई अंश नही ये अलग बाज है कि मौजूद सौपानो मे हालिया केन्द्रिय सत्ता ने अवश्य इस पर प्रभावी जीत हासिल की है मगर समुचा शुद्धिकरण हो गया हो यह असत्य है क्योकि कहते है जब किसी भी विकृति की स्वीकार्यता समाज से मिल जाये और वह जीवन मे सहर्ष अंगीकार करने योग्य हो जाये तो ऐसे मे पूर्ण शुद्धिकरण की कल्पना करना बैमानी हो जाती है क्योकि सत्ता संस्था और सरकारी सरोकारो को संचालित करने बाले लोग भी तो उसी समाज से आते है जिसने भ्रष्टाचार को अनौपचारिक ही सही अंगीकार कर सहर्ष स्वीकार्यता दे रखी है और अब वह खुद कोई सबाल करने मे शर्म मेहसूस करता है ऐसे मे हम कितने ही प्रयास क्यो न कर ले मगर किसी भी क्षैत्र मे सर्बकल्याण के सार्थक प्रयास पूर्ण प्रभावी होने बाले नही आज जरूरत एक बड़े बदलाव की है मगर लोग है कि अब वह इस विकृति को त्यागना ही नही चाहते जिसके लिये प्रयास भी उन श्रेष्ठजन स्वजनो को करने होगे जिन से पीढ़ी दर पीढ़ी यह कार्य अपेक्षित रहा है । काश हम ऐसा कर पाये तो आज के समय मे यह हर नागरिक के लिये जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी मगर कार्य कठिन और अरूचीकर हो सकता है मगर किसी न किसी को तो शुरूआत करनी ही होगी । जय स्वराज ।

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