आस्था से विमुख श्रेष्ठजनो का महाप्रयाण मानवता पर कलंक
सर्बकल्याण मे न काॅफी साबित होता सारा सामर्थ , संसाधन
अब तो सजग पुरूषार्थ ही बचा सकता है यह सुन्दर कयानात
व्ही. एस. भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
जिस दुरगति शिकार हमारी महान सभ्यता , संस्कृति , संस्कार आज है यह न तो हमारा प्रारव्ध है न ही भबिष्य हां इसे बर्तमान अवश्य कहा जा सकता है जिसके लिये शायद ही मौजूद पीढ़ी को दोषी होने के बाबजूद भी दोषी आने बाले भबिष्य मे ठहराया जा सके क्योकि आने बाले समय मे वही श्रेष्ठजन दोषी करार दिये जायेगे जो आज अपनी अपनी आस्था से विमुख हो मानवता के इस नाश को अपनी खुली आंखो से देख रहै है । मुझे यह लिखते वक्त कतई अफसोस नही की मे भी एक ऐसे मानव समाज का भाग हुॅ जिसके गैर पुरूषार्थी होने पर आने बाली नस्ले हंॅसने बाली है मातम इसलिये वह नही मनायेगी क्योकि हमारी कृतज्ञता ही कलंकित कही जाने बाली है । अगर हम इतिहास के शुरूआती पन्नो को पलटे तो पायेगे की हूड़ तुर्क चंगेज मुगल अॅग्रजो से लेकर आजादी ही नही आजादी के कई दशको तक हमारी संस्कृति , परिवारिक संस्कार हमारी सभ्यता की रक्षा करते रहै मगर सूचना क्रांती के अनियंत्रित दौर ग्लोवल इण्डिया की चाहत ने मानो हमारा असली चेहरा हमारे सामने लाकर छोड़ दिया जिसका कुरूप चेहरा आज कोई देखने तैयार नही हालात अब यह हो लिये है मानो अंधो बस्ती मे आयने तो वही गूगे बैहरो के मेलो मे मुशायरे और कविसम्मेलन चल रहै हो सत्ता दरबार ऐसे जहां चापलूस चाटुकारो के पौ बारह चल रहै हो क्योकि अब न तो कोई सच सुनना चाहता है न ही व्यवस्था का कोई कुरूप चेहरा देखना चाहता है । सबकी अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग चल रहा है और जन धन दोनो हाथो से बैभाव लुट रहा है । अब ऐसे मे यही सेवा बची है और यही सर्बकल्याण व्यवस्था सुधार के नाम सत्ता की मलाई कूटने बालो को क्या पता कि चैरासी लाख यौनी भोगने के पश्चात मिलने बाला मानव जीवन कौन कौनसे नरक , खुशहाॅल समृद्ध जीवन के खातिर भोगने पर बैबस हो चुका है । ऐसा नही की सत्ता की मलाई काटने बाले भी अब इस दंश से अछुते हो मगर क्या किया जाये बैबसी मे ही सही उन्है भी यह सब कुछ भोगना पढ़ रहा है जिसके लिये सीधे तौर दोषी वह श्रेष्ठजन है जो कारण जो भी रहै हो व्यवस्था बिगाड़ या सुधार के समय चुप बैठै रहे और समय पर अपने पुरूषार्थ सामर्थ से तत्कालीन सत्ताओ और बिगाड़बादियो को यह बताने दिखाने मे अक्षम असफल रहै कि जीवन का सत्य क्या है और मानव धर्म के क्या मायने है इसी चूक का परिणाम आज समुचा मानव समाज भोगने पर विवस है अगर श्रेष्ठजन आज भी नही जागे तो वह दिन दूर नही जब जेयष्ठ और श्रेष्ठ जैसे शब्द जो आज भाषाई प्रचलन मे है वह भी शब्दकोश मे ढूड़े नजर नही आयेगे । समय का तकाजा है और बर्तमान नेतृत्व भी सामर्थ वान अगर ऐसे मे भी हम गैंग गिरोहबन्द रह उस महान संस्कृति सभ्यता संस्कारो को पुर्नस्थापित करने मे अक्षम असफल सिद्ध हुये तो भबिष्य निश्चित ही मौजूद मानव जीवन को माफ कर दे मगर हमारी अपनी पीढ़िया हमे हमारे इस दुराग्रह के लिये कभी माफ नही करेगी और न ही मौजूद जीवन हमारा समृद्ध खुशहाॅल रहने बाला है । जय स्वराज ।

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