कोरोना खात्मे से पहले ही खेल शुरू ............तीरंदाज ?
लोक हुआ डाउन , जनधन उलीचते भाई लोग
व्ही. एस. भुल्ले
भैया - ये क्या ? ये तो खात्मे से पहले ही खेल शुरू हो लिया और तीसरी संभावित लहर के मददेनजर नई तैयारियो का दौर शुरू हो लिया , आखिर थारे को क्या लागे ? कि किलर कोरोना का मामला सुलट लिया , मगर सच बोल्यू तो म्हारे कानो सुना आॅखो से देखा एक चैनल बाला बोल रिया था कि अभी भी खतरा टला नही , आखिर मने कै समझु कै दुकान सजाना है या अभी भी फटटा ही लगाना और हर रोज उठाना है ।
भैयै - अरे बाबले थारे जैसै मद समझ बालो की ही तो परेशानी है मने तो बोल्यू कै अभी कुछ दिन और सर्ब खा फिर अपना साजो सामान सड़क पर सजा टी वी बाला बाबू सही बोल्या है कि खतरा अभी टला नही है फिर खतरा सरकार का हो या फिर कोरोना का ।
भैया - तो फिर अच्छे दिन कब आयेगे और बैधड़क बाजारो मे मुॅह खोल कब घूम और बोल पायेगे और कब तक कोरोना महान के रहते साॅसल डिस्टेन्थ का पालन करना है और बार बार हाथ धो हाथ साफ करते रहना है और फिर कब होगा सबका साथ सबका विकास हालिया खबर तो खबर नबीसो के बीच से जनधन का उलीचा लगा खुद की छबि चमकाने बालो के कैम्प से आ रही है और गर्मी के मौसम मे तुषार की चिन्ता सता रही है , काठी टूटे इन सियासी लोगो की जो भाई लोग तुषार को लेकर हल्ला मचा रहै है और अपनो की ही कोचनी से फूटी आॅख पर मातम मना रहै है । भाया क्या इस महाबली की बली से तो म्हारी सरकार और कोरोना से म्हारे अपनो की जान बच जायेगी या फिर बिघन संतोषियो की मण्डली कोई नया खेल जमायेगी ।
भैयै - मामला तो संगीन है मगर कहते है मूर्ख बैजुबानो की बस्ती मे आजकल बोलता कौन है । जन्म जबानी मे तो जबानी उतर्राध की ओर चल दी है उतरार्ध बुढ़ापे की ओर तो बूढ़ी काठी सिर्फ इसी उम्मीद मे निकल ली है कि अच्छे दिन आयेगे मगर इन 18 बर्षो मे सिर्फ छबि चमकाने मिटारने के शायद ही किसी ने कोई दूसरा खेल देखा हो वो भला हो म्हारे माईबापो का जो उनकी निष्ठा के चलते सेवा परवान चढ़ ली वरना दाल दलिया तो छोड़ो राशन पानी के संघर्ष मे एक छदम भी इन अभाव ग्रस्तो को नही मिलनी थी ।
भैया - मने जाड़ू मगर कै करू कोरोना काल तो जहां आम लोगो पर कहर बन कर टूटा है तो वही भाई लोगो का तो मानो संकट मे भी बैहिसाव छबि चमकाने का अवसर छीका बन कर टूटा है । मगर दुर्भाग्य की आज भी जन कल्याण , सर्बकल्याण मे शास्तार्थ के नाम धनानन्दो की सभाये चल रही है और सच बोल्यू तो ऐसी सत्ताओ की शान मे कसीदे गढ़ने बालो को खूब मुॅह भरके बख्सीस बट रही है । कुछ का जीवन तो बख्सीस बांटने बटौरने मे निकल लिया मगर उन शमसानो का क्या ? जो आज भी अपने उत्थान के सपने लिये अपनी आॅखो से उन्है मरता जलता देख रहै है जो कल तक हलाकू जंग जू कहलाते थे और आज अभावो के बीच खाली हाथ , और बगैर अपनो के साथ के ही जलने मरने पर मजबूर हो चुके है ।
भैयै - मुये चुप कर जा कै थारे को मालूम कोणी देश प्रदेश संभाग जिले गाॅब गली मे कोबिड का कहर चल रहा है न कोई जलूस न ही कही मजमा लग रहा है काश तने भी रायता फैला समेटने का गुर इन महान गुरूओ से सीख लिया होता तो आज थारा भी यह हाॅल न हुआ होता बच्चु मय कुनबे के उस्ताद लोग मलाई मे घपे है और थारे म्हारे धन से सारे उपकार दया के खेल चल रहै है वह जनधन ही है जिस पर छवि चमकाने और पोतने के खेल चल रहै है । काश नैतिक शाला मे तने भी गुरू दीक्षा ली होती तो थारी काठी भी मुरझाने के बजाये लाल हो खूब फल फूल रही होती । अब क्या कहु मे थारे पशुवत जीवन के बारे काश तने मानवधर्म का पाठ छोड़ मैकाले को पढ़ा होता और ढूढ़ ढूढ़ कर इन मैकाले के वंशजो का इतिहास पढ़ा होता तो आज मुये मुगल अॅग्रेज थारे चरणो मे होते ।
भैया - मने जाड़ू मगर कै करू अब तो शिकजा सिखंडियो के बीच ऐसा कसा है अब न तो कोई चाड़क्य न ही चद्रवरदाई , न ही इस महान भूभाग पर पूर्णिया पण्डित बचा है न ही वीर शिवाजी न ही पेशवा जैसै सिपहसालारो कांरबा बचा है । अब ऐसे मे मने कुछ कर पाउ या न कर पाउ मगर इतिहास कहता है इस भूभाग पर ऐसा दौर कई मर्तवा चला है । मगर म्हारे को तो म्हारे गौवंश की चिन्ता सताती है और लोकतंत्र मे गैग गिरोह चलाने बालो को देख म्हारी रूह कांप जाती है अगर जनतंत्र यह है तो म्हारे को तो मानव कहलाने पर शर्म आती है । मगर सच बोल्यू भाया तो गर समय मिला तो एक दांव तो मने म्हारे गौवंश की खातिर अवश्य लगाउगा और उन्है उनका हक अवश्य दिलवा सच्चा मानव धर्म निभाउगा म्हारे को तो इस जीवन मे सबसे बड़ा धर्म कर्म अब यही है । जय स्वराज ।

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