सुरषा साबित होती स्वार्थ सिद्धि , जीवन हुआ बैहाल
श्राफ भोगता सुन्दर समृद्ध शहर
वीरेन्द्र शर्मा
11 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
सौ बर्ष पूर्व सुन्दर समृद्ध अत्याधुनिक सुविधाओ से लेश एक ऐसा शहर जिसे तत्कालीन शासको द्वारा घनघोर जंगलो के बीच पठारी क्षैत्र होने के बाबजूद विभिन्न सुबिधाओ से लेश कर अपनी स्टेट की राजधानी बनाया था जहां सौ बर्ष पूर्व दो वाई दो किलो के रेडियस मे बसे इस समुचे शहर को प्राक्रतिक रूप से वातानुकूलित रखने 18 तालाबो की श्रखंला बारिष के पानी वहाब को ध्यान मे रखकर तैयार की गई जिन तालाबो की तलहटियो समृद्ध रखने जामफलो के बगीचो का निर्माण हुआ तथा समुचे शहर को चैड़ी चैड़ी सड़क चैराहो पुल पुलियाओ सहित पक्की नहरो से पाटा गया जिससे तालाबो के आॅव्हर फलो होने की स्थति या अत्यअधिक बारिस होने पर बारिस के पानी को सुविधा जनक निकासी मिल सके इसक अलावा ग्रांड होटल , सांस्कृकि भव्य भवन , हरी दूव से पटा रहने बाला पोलो ग्राउन्ड जिसे अन्डर ग्राउन्ड अष्ठधातु की पानी लाइन से हरा भरा रखा जाता था , कृषि मण्डी , चूने की पक्की सड़क , रेल सुबिधा बच्चो खेलने पार्क जो आज गाॅधी पार्क के नाम से जाना जाता है । इसके अलावा क्लव भव्य कोठिया शासकीय भवन रोशनी के लिये शहर भर मे बड़े बड़े लैम्प , नेशनल पार्क , आवार पशुओ के लिये कानी हाउस ,छाबनी , पुरानी शिवपुरी , मल्टीपरपज हाईस्कूल , शहर भर मे सीवर लाइन , कुओ वावड़ियो की श्रखला दिव्य भव्य मन्दिरो के साथ झील झरने अगर यू कहै की जो सुबिधा आज मानव जीवन को नसीब नही वह सब कुछ सहज था । मगर दुर्भाग्य से आज सब कुछ स्वार्थ की सुरषा सब कुछ निगल जीवन को बिलखने पर मजबूर किये हुये है । अगर यो कहै कि अब यह चीखने चिल्लाने और स्वयं के स्वार्थ पूरे कर मलाई काटने बालो का यह सुन्दर समृद्ध शहर अडडा या बाड़ा बन गया है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी ।
ऐसा नही कि आजाद भारत मे इसे सबारने के प्रयास नही हुये या अभी नही हो रहै हो रहै है मगर स्वार्थियो मलाई काटू गैगो के रहते कोसिसे परवान नही चढ़ पा रही फिर वह पेयजल का मामला हो या फिर बिजली सड़क का मामला हो करोड़ो की सड़को का सुबिधा के नाम जिस तरह से सत्यानाश यह मलाई काटू करते है उससे अच्छे अच्छो का कलेजा हिल जाये मगर शहर मे हाॅवी यह गैग गिरोह इतने सातिर है कि इन पर लानत मलानत छोड़ो उनकी चर्चा तक कोई करने तैयार नही क्योकि वही मुनसिब और वही मुलाजिब की स्थति मे है अगर बैबस लोगो की नुमायस क्या होती है अगर किसी को 21बी सदी मे देखना हो तो वह शिवपुरी अवश्य आये । क्योकि लोकतंत्र का केनवास ही ऐसा है जिससे जो दिख जाये वह कम है । शहर को कभी धूल ढेर तो कभी समर्पित जन सेवको को मलानत मलने बाले इन सातिर दुसासियो का साहस इतना है कि यह अब तो उन ताकतो को भी झुकाने से नही चूकते जिनके आगे अच्छे अच्छे तीस मारखा तक पानी मांग जाते है मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था का आज यही कड़बा सच है बैबस मजलूम लोगो व्यथा , कि उनकी इस बैबसी दुरगति पर न तो कोई अब बोलने तैयार है न ही उस तरफ कोई देखने तैयार अरबो फुक जाने के बाद भी लोगो घरो तक न तो बूंद पहुॅच रही है न ही नव निर्मित सड़के ही सुरक्षित बच पा रही है हर रोज लाइन फूट रही है और हर रोज जुड़ रही है मगर अभागे शहर को कही से भी राहत नही मिल रही है । अपने अपने आकाओ से बरदान का दुरूपयोग करते मानवता के इन दुश्मनो से कौन पूछे कि आखिर क्या अपराध है इस शहर का और उन विभूतियो का जो दिल रात एक कर साधन संसाधन जुटाने मे लगे रहते है क्या इस सौभाग्यशाली शहर को किसी का वाक्य मे ही श्राफ लग गया है । देखना होगा आखिर कब सुधरते है इस शहर के हालात ।

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