लोकनीति , सत्ता , शिक्षा से मिलेगे नये आयाम


धोखा , धमाका , दहशत से मुक्त व्यवस्था से  , होगी समृद्धि और , होगा कल्याण 

 परिणामो की प्रमाणिकता से सिद्ध होता सत्ता का सामर्थ 

व्ही. एस. भुल्ले 


13 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

जिस लोकनीत , सत्ता , शिक्षा के सहारे समृद्ध भूभाग पर कल्याण का कांरबा बढ़ रहा है वह खासकर उन लोगो के लिये काबिले गौर होना चाहिए जो उधार की सियासत या विरासत के सहारे षड़यंत्र पूर्ण आचरण से सत्ता मे काबिज हो सियासी स्वस्वार्थ पूरे कर बड़े जनसेवक जन नायको मे अपना नाम लिखबा सियासत मे अमर होना चाहते है । और लोक , जन की आशा अकांक्षाओ से इतर अपनी सात पीढ़ियो के आर्थिक भबिष्य को सुरक्षित करना चाहते । मगर कहते परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है सो बदलाव के इस दौर मे किस किस को क्या हासिल होगा यह तो भबिष्य की बात है मगर इतना तो तय है कि जिस तरह से आम जीवन को धोखा , धमाके , दहशत से मुक्ति मिली है और दहशत फैलाने बालो पर लगाम कसी है वह किसी छिपी नही । मानवता के दुश्मनो को घर मे घुसकर मारने की जो परिपाटी शुरू हुई है वह इन्सानियत , मानवता के दुश्मनो के गले की हडडी साबित हो रही है । अगर यो कहै कि आज प्रमाणो की प्रमाणिकता यह सिद्ध कर रही है कि मौजूद सियासत मे क्या नया हुआ है । ये अलग बात है कि आज सियासत मे भले ही वैचारिक विरोध का स्थान सियासी दुश्मनी ने ले रखा हो मगर लोकनीत , लोकसत्ता शिक्षा की सियासत यह समझने काफी है कि मौजूद नेतृत्व सत्तागत सक्षम ही नही सामर्थ शाली भी है जो समय की दरकार भी है । आज जिस तरह से देश विश्वविरादरी के बीच सीना ढोककर मानव जीव जगत के सेवा कल्याण की मशाल लिये खड़ा है तो वही देश के अन्दर जड़े जमाये देश के दुश्मनो को सबक सिखा सही रास्ते पर लाने की कोसिश मे लगा यह उसी लोकनीत सत्ता के सामर्थ का ही परिणाम है कि लोग भयमुक्त होकर अब भबिष्य के सपने बुनने आतुर है भ्रष्टाचार मुक्त शीर्ष सत्ता से कम से कम यह स्पष्ट संदेश है कि समाज मे मौजूद भ्रष्टाचार जैसी महामारी पर कोई रहम की गुजांइस नही क्योकि यही वह जड़ है जिसने हंसते खेलते जीवन को शारिरिक और मानसिक तौर पर अपंग बना रखा था तथा लोककल्याण की कमजोरियो का लाभ उठा भ्रष्टाचार मे आस्था रखने बाले लोग समूह इस सामर्थशाली नस्ल और राष्ट्र् को अपंग बना इसे बर्बाद करना चाहते थे । मगर सक्षम नेतृत्व लोकनीत , सत्ता मे आस्था रखने बालो ने ऐसा होने नही दिया परिणाम कि लोकनीत और लोकसत्ता के सामर्थ से देश के बड़े बड़े मसले बगैर एक बूंद खून वहाये सुलझ गये और जो मसले राष्ट्र् के सामने सुरसा बन सामने खड़े है वह भी जल्द ही सुलट जाये तो किसी को कोई अतिसंयोक्ति नही होनी चाहिए । इस लिये जरूरी है कि सियासत मे सियासी भेद हो सकते बैबसी मजबूरी जन कल्याण मे हो सकती है मगर वैमनस्यता नही होनी चाहिए । सत्ता के मार्ग सेवा कल्याण का यही नियम आनादि काल रहा से रहा है कहते है सेवा कल्याण मे सामर्थ की सराहना और पुरूषार्थ का सम्मान सत्ता सियासत मे अवश्य होना चाहिए । यही सदाचार संस्कृति मानव जीवन को श्रेष्ठ और सर्बकल्याणकारी बनाती है और आने बाली पीढ़ी को यह संदेश की हमारे पूर्वज अग्रज कैसै थे और हमे जीवन मे किन संस्कारो को अंगीकार करना श्रेष्ठकर रहेगा । जय स्वराज । 


  


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