जबाबदेह मुक्त , बैजान ब्यवस्था से समृद्धि की उम्मीद
सबालो की सुलगती ज्वाला मे खाक हुये जीवन सरोकार
व्ही.एस. भुल्ले
16 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
आर्थिक कंगाली के बीच जिस तरह से कामगार जीवन घसिटने पर मजबूर है वह किसी से छिपा नही मगर दुर्भाग्य कि प्रदेश की इस दुर्गति पर कोई भी मुॅह खोलने तैयार नही रोजगार के अकाल के बीच कामगारो के बीच शासन की कंगाली के चर्चे भले ही आम हो मगर किसी को भी शर्म है यह कोई कहने तैयार नही खाली खजाने पर कोरोना का पर्दा कब तक पढ़ा रहेगा यह तो वह नीति नियोक्ता ही जाने जिन्है आम जीवन अपनी समृद्धि खुशहाॅली के लिये चुन कर उन सत्ता सौपानो तक पहुॅचाते है जहां आम जीवन को सरल समृद्ध बनाने के फैसले लिये जाते है जहाॅं आम जीवन की समृद्धि खुशहाॅली के सपनो को अमली जामा पहनाये जाते है मगर जीवन की कंगाली इस बात की गबाह है कि काम ठीक से नही हुआ नही और हो भी कैसै कहते है जब निर्जीव व्यवस्था के रथ पर जबाबदेह मुक्त जीवन की ध्वजा पताखा फहरा रही हो तो फिर जीवन कैसै खुशहाॅल समृद्ध बन सकता है जो व्यवस्था का स्थाई भाग है उनका जीवन फिलहाॅल भले ही आर्थिक चिन्ताओ से मुक्त हो मगर आम जीवन जिस तरह से बिलख रहा है वह किसी भी व्यवस्था के शर्मनाक ही कहा जायेगा । जिन लोगो ने बतौर अपना परिवार पालने शासकीय कार्य मे रोजगार पा रखा है उनके 2-2 सालो से भुगतान लंबित है जो कोरोना काल मे जान की बाजी जीवन के लिये लगा सेवा मे लगे रहै है उन्है आज वेतन के लाले है । आय के श्रोतो पर पहरेवर दारी के बीच संपदा की लूट मची है लुटरे इतने ताकत वर सक्षम है कि वह खुलेयाम शासन को अपने कृत्यो से मुॅह चिड़ाते रहते है मगर सब बैबस है कारण न तो कोई इस बिगड़े ढर्रे को सुधारना चाहता है न ही व्यवस्था के भाग बने लोगो को जबाबदेह बनाना चाहता है सत्ता सियासत के सर्राटे मे झूटी लोकप्रियता बढ़ाने इस बिगड़े सिस्टम को बजाये सुधारने के और बिगाड़ा जा रहा है बजाये जबाबदेह बनाने और समय पर सेवाये प्रदान करने के चहुॅओर कोहराम मचा है और कंगाल खजाने पर सबाल अब तो बीच सड़क पर हो रहा है । बैहतर हो कि झूठी शान शौकत और स्व स्वार्थ से आगे बढ़कर कार्य हो नही तो यह निर्जीव सिस्टम जबाबदेही के आभाव मे नीतिनियोक्ताओ एवं सेवा कल्याण का स्वाग रचने बालो को कही का नही छोड़ने बाला है । थोड़ा कहा बड़ा समझा जाये आज कि यही जरूरत है जय स्वराज

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