माफिया राज से थर्राया मानव , जन , जीवन


कंटक , बाधा , अभाव श्रेष्ठ जीवन का आधार नही 

सर्बकल्याण मे सत्ता का धर्म समृद्ध जीवन की सुरक्षा , संरक्षण होता है । न कि अपने सामर्थ का अधिकार 

व्ही. एस. भुल्ले 


20 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

यू सतयुग से लेकर द्वापर त्रेता और अब कलयुग सभी युग मे मानव जन जीवन का आधार सर्बकल्याण मे निहित रहा है जिन्है समय समय पर खुला संरक्षण रक्षण सत्ता और सामर्थ का रहा है । सत्य और समृद्ध जीवन का यह सूत्र कड़े संघर्ष के बाद आज यहाॅ तक पहुॅचा है कहते है जीवन मे कटंक , बाधा , अभाव कभी श्रेष्ठ जीवन का आधार नही हो सकते न ही सर्ब कल्याण से दूर सिद्ध सामर्थ का अधिकार मगर आज तब जब जनता का जनता के लिये जनता द्वारा स्थापित सत्ताओ के रहते गली , गाॅब से लेकर नगर महानगरो तक माफिया राज मानव , जन , जीवन को प्रभावित कर रहा है तो यह समुचे मानव जगत के लिये शर्म की बात होना चाहिए ंमगर लगता नही कि आज श्रेष्ठ समृद्ध जीवन मे इसका कोई मूल्य हो वरना माफिया राज इस तरह से आम जीवन के नैसर्गिक अधिकार को प्रभावित नही करता ऐसा नही कि माफिया राज सिर्फ समाज मे ही जड़े जमा चुका है बल्कि आज इससे न तो सियासत , सत्ताये , संस्थानो को सुशोभित करते लोग अछूते है न ही वह लोग जिनके अस्तित्व का आधार ही सर्बकल्याण है । मजे की बात तो यह है कि जब संबैधानिक पदो को शुसोभित करने बाले सक्षम सामर्थ शालियो के आगे अभागे असहाय लोग माफिया की कारगुजारियो की शिकायत करते और परिणाम शून्य मिलते है तो सच मायने मे तो हालात ये है कि सेवा कल्याण के क्षैत्र से लेकर विकास और प्राकृतिक संसाधनो के दोहन , राहत वितरण तक मे माफिया अपनी औकात अनुसार पैर जमाये हुये है मगर इससे लोहा लेता एक भी सक्षम पुरूषार्थी का न दिखना आज के जीवन मे बड़ी ही दर्द की बात है आखिर सक्षम समृद्ध सामर्थशाली लोग क्यो अक्षम असफल हो रहै है यह तो वही जाने मगर आज जिस तरह से मानव जीवन कुल नासी के साथ जन जीवन प्रकृति नासी होता जा रहा यह अवश्य चिन्ता का विषय है मगर संदेह इस बात का है कि कही यह चिता का कारण साबित न हो सजृन मे यू तो हर जीवन की अपनी जबाबदेही है मगर पृथ्वी पर मौजूद अन्य जीवनो को छोड़ मानव जीवन की बात करे तो वह बड़ा लापरबाह और गैर जबाबदेह साबित हो रहा है जिस पर हर श्रेष्ठ जन को विचार अवश्य करना चाहिए क्योकि सत्ताओ का अपना काम होता है मगर सत्ता से लेकर सर्ब कल्याण मे सबसे बड़ी जबाबदेही मानव की होती है और यह उसका नैसर्गिक धर्म भी है और अनादिकाल से रहा भी है काश इस सच को हम जितनी जल्द समझ जाये वह समस्त जीव जगत मानव जगत के लिये बैहतर होगा । जय स्वराज ।  


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