स्वयं सिद्ध समृद्धि में लज्जित हुआ कल्याण


छापे उगलते अकूत संपत्ति , भगवान हुये हैरान 

वीरेन्द्र शर्मा 

विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 23 जुलाई 21 


म.प्र. स्वयं सिद्ध समृद्धि मे जो समान भाव सम्पन्नता का प्रदर्शित हो रहा है उसके मायने जो भी हो मगर छापो मे निकलती सेवको के यहां अकूत संपत्ति कितनी जायज या कितनी नाजायज है यह तो बाद मे सिद्ध होगा मगर जो सुर्खिया सेवा कल्याण के बाजार मे सरगर्म है वह कुछ कम नही और हो भी क्यो क्योकि आज के समय जो पकड़ा जाये वह बैचारा बड़ा चोर और जो मसकेई दबा जाये वह साहुकार सो इस पचड़े मे अपने राम की तो राय नही । इतिहास गबाह है इस तरह के पचड़ो से कई तो बैदाग निकल जाते है तो कई बैचारे सेवा कल्याण का मूल्य जीवन भर चुकाते है । क्योकि कि बर्तमान लोकतंत्र मे विधि का राज है न कि ब्रम्ह का विधान सो जो विधिसंबत लोग कहै उसे ही सही मान लेना चाहिए इसी मे विधि विधान दोनो की भलाई है । अब पकड़े जाने बालो मे कोई यंत्री हो या फिर कोई बाबू लगे तो सभी सेवा भाव मे ही है । अब विधि के विधान या दस्यु राज मे कोई इतना बड़ा जनधन पर डाका अकेले ही डाल अपना घर भर ले यह संभव नही कोई तो सरगना होगा मगर आम सामने की मुठभेड़ मे सरगने का अंधेरे का लाभ उठा भाग जाना और किसी छुट भैया का पकड़े जाने कोई नई बात नही यह खेल तो चंबल की घाटी से लेकर सरयू की तलहटी तक चलता रहा है मगर हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती यह है कि अब न तो गली मोहल्लो मे कोई दादाभाई रहै न ही बीहड़ो मे कोई नामचीन दस्यु डकैत जो लोकतंत्र का सुखद पहलू है सच कहै तो सेवा कल्याण से पटी सियासत की यह सबसे बड़ी उपलब्धि कही जायेगी । बहरहाॅल निष्ठा को लेकर जो बबाल छापो से कटा है वह कितना सही कितना गलत यह तो आने आला समय ही तय करेगा मगर लज्जित कल्याण के बीच जिस तरह से अपने माल के लूट के चर्चो से लोकतंत्र के भगवान हैरान परेशान है यह आज बड़ा ही सोचनीय बिषय हो गया है मगर संज्ञान कौन ले इस पर बादबिबाद होना स्वभाविक है मगर स्वयं सिद्ध समृद्धि का आखिर मुकाम यही है तो इसमे किसी को अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए । 


 


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