अविश्वास , पहचान का संकट , स्थापित संस्थाये हुई बैजान


घटिया स्तर का प्रदर्शन करते पद और सौपान 

बंटाढार की ओर बढ़ती नव संस्कृति और संस्कार 

व्ही. एस. भुल्ले 

24 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


मौजूद माहौल मे कुलाछै मारती नव संस्कृति संस्कारो के बीच जो अविश्वास पहचान का संकट खड़ा हुआ है और स्थापित संस्थाये जिस तरह से बैजान नजर आती है उससे हजारो बर्षो की त्याग तपस्या , अनगिनत कुर्बानियो का बंटाढार होना तय है जिस घटिया स्तर के प्रदर्शन से अब तो पद सौपान भी शर्मसार है ऐसे मे मानव जीवन की उपायदेयता पर विचार न हो इससे बढ़ी कर्तव्य विमुखता और कोई मानव जीवन की हो नही सकती अपनी अपनी समृद्धि अपने अपनो के विकास मे डूबे जीवन की यह अज्ञानता ही कही जायेगी जिसे आज स्वं स्वार्थ के आगे सेवा , सर्बकल्याण जैसै शब्द अब निशब्द हो चुके है हर एक समृद्ध सामथ्र्यवान शक्तिसाली मानव अपने पुरूषार्थ का उपयोग सर्बकल्याण से इतर स्वकल्याण के लिये कर लेना चाहता है फिर उसके लिये उस महान संस्कृति संस्कारो की होली जले या फिर उसका जनाजा निकले उससे उसे क्या लेना देना सेवा कल्याण के नाम गैंग गिरोह बंन्द होते मानाव समूहो का लक्ष्य जो भी हो मगर आने बाले समय मे इस संस्कृति और संस्कारो से किसी का भला होने बाला नही । पद सौपान गरिमा के बिरूद्ध जिस तरह का आचरण आजकल मानव समाज मे जड़े जमाता जा रहा है वह किसी वीभत्स सपने से कम नही मगर कोई नही चाहता कि वह सर्बकल्याण के मार्ग पर बढ़े नये नये फाॅरमूले और नये नये कल्याण के तरीको से भले सज्जन लोग की रूह कापती हो मगर शुरूआत कौन करे क्योकि जीवन का स्थापित विधान अब अध्यात्म तो विधि कुछ लोगो के सामने खिलौना बनती जा रही है और स्व कल्याण उनका साध्य सो आज जब इन बिषयो पर चर्चा होती है तो इसे लोग पढ़ने सुनने लायक ही नही समझते क्योकि अब जीवन संस्कृति मानव जीवन को स्थापित संस्कृति से इतर प्राक्रतिक जीवन मे मौजूद जीवनो की भांति हो चली है जिसके तीन नर्व सिस्टम काम करते है मसक्के खाओ , खाते समय कमजोर सामने है तो उसके हिस्से का भी खा जाओ न भागे तो उसे मार कर भगाओ अगर खुद को कोई हानी पहुचाये तो कष्ट होने पर जोर जोर से चिल्लाओ जनरेशन बढ़ाओ और आराम फरमाओ कुछ समय पहले क्या हुआ उसे तत्काल भूल जाओ शायद सभ्य मानव जीवन की या तो यह नियती बन गयी है या फिर गैग गिरोहो मे तब्दील सेवा कल्याण ने बना दी है मगर यहां यक्ष सबाल यह है कि इनका संज्ञान कौन ले कौन अपना सब कुछ दांॅब पर लगा सर्बकल्याण मे योगदान दे कोई मोहब्बत से समझाना बुझाना चाहता है तो कोई लटठ के दम पर सर्बकल्याण की ध्वला लहराना चाहता है यहां तक तो फिर भी ठीक था मगर उन्है कौन समझाये जो पल पल झूठ और फरेब कर स्वयं के स्वार्थो के लिये समुचे ज्ञान विज्ञान विधान विधि सबका उद्धार कर स्वयं स्वर्ग लोग मे सत्ता सुख चाहते है सच यह है जो लोग भी जिस भी कारण बस आज अपनी नैसर्गिक निष्ठा , विश्वास , पहचान से विश्वास घात कर रहै है ऐसा कोई पहली मर्तबा इस मानव जीवन मे नही हो रहा ऐसा पहले भी होता रहा है मगर उनके साक्ष्ी वीभत्स परिणामो के बाबजूद भी अगर कोई ऐसा आचरण व्यवहार जीवन मे रखता है तो ऐसा जीवन सिर्फ दया का पात्र ही हो सकता है किसी समृद्ध इतिहास का भाग कदाचित नही । बैसै सभी सज्जन , श्रेष्ठजन समझदार है मगर जीवन की निष्ठा मे कोई सबाल है तो मानव जीवन मे चर्चा आवश्य होनी चाहिए । और उन लोगो की सराहना भी जो अपना सारा जीवन गला सर्बकल्याण के मार्ग पर संघर्ष कर अपने पुरूषार्थ से इस समुची सृष्टि और मानव जीवन को श्रेष्ठतम दिशा देने अपना सब कुछ नैयोछावर कर जीवन को धन्य करने मे लगे है । जय स्वराज । 

 

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