बाॅंटने डाटने के खेल मे अकांक्षा हुई अनाथ


संघर्ष के मैदान मे तब्दील हुआ सेवा कल्याण 

जीवन सरोकारो से दूर भागती सियासत 

वीरेन्द्र शर्मा 

28 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


आज अनाथ अकांक्षा बड़े बड़े सामथ्र्यशाली , पुरूषार्थियो के बीच भले बिलबिलाने पर बैबस मजबूर हो ऐसे मे गैंग गिरोह बन्द सियासत को क्या लेना देना आज जिस तरह से सेवा कल्याण संघर्ष के मैदान मे तब्दील हो चुका है ऐसे मे आम जीवन को उससे कोई बहुत बड़ी उम्मीद भी नही रखनी चाहिए क्योकि जिस तरह से सियासत सत्ता की खातिर जीवन सरोकारो से दूर होती जा रही है वह न तो आम जन जीवन , या जीव जगत के हित मे है न ही आने बाले समय मे सियासत के हित मे है । सर्बकल्याण के नाम आज जीवन जिस तरह से बिलबिला रहा है वह किसी से छिपा नही मगर सियासी दलील की माने जो कभी खुलेआम व्यक्त होने के नाम वैवा नजर आती है वह भी सत्ता संग सुहागन होते ही सारे सरोकारो का जनाजा निकालने तैयार रहती है अब ऐसे मे सृजन का मार्ग का कैसै प्रस्त हो यह तो वह सेवक और सर्बकल्याण का दम भरने बाले ही जाने मगर इतना तय है कि आज जिस तरह की अपेक्षा सत्ता सियासत मे आम जीवन से बढ़ती जा रही है और मानव संस्कृति छलि जा रही है उसके परिणाम भले ही अवश्यम भावी हो मगर न तो भबिष्य मे ऐसी सियासत और न ही जन जीवन सहित जीव जगत का कोई बड़ा भला होने बाला है । लोकतंत्र मे जीवन मूल्यो की रक्षा उनका संरक्षण का अपना मार्ग है मगर इन सरोकारो से दूर सत्ता और सियासत मे सरोकारो से इतर सियासत सिर्फ और सिर्फ सियासत सत्ताउन्मुखी होने लगे तो निश्चित ही वह आम जीवन पर गहरा और बुरा प्रभाव छोड़ती है । समाधान मे सीधी सी बात है अगर सत्ता के समर्थन है तो उसे अपनी पूर्ण क्षमता के साथ जनहितैषी कार्य बगैर किसी संकोच के करना चाहिए और सियासत के पास जनहित मे कोई अहम मुददा है तो उसे पूरे जोर शोर से सदन सहित सड़क पर भी उठाना चाहिए यही लोकतंत्र के मायने है मगर जन आस्था का दुरूपयोग कर अपने अपने ऐजेन्डे आगे बढ़ने बालो की शायद अब कोई दिलचस्वी नही इसलिये एक दूसरे को कटघरे मे खड़ा करने का खेल जन धन पर बखूवी चल रहा है । यह सही है कि इस महान राष्ट्र् की एक बड़ी आबादी आज भी अभाव ग्रस्त है बैबस मजबूर है जिस हर कदम पर सत्ताओ से सहयोग की जरूरत बनी रहती है मगर इसका यह मतलब कदाचित नही लगा लेना चाहिए कि उनकी यह बैबसी मुफलिसी इतनी लाचार है कि वह सही गलत मे भेद ही नही कर पाये मगर छदम व्यवहार से आखिर कब तक भरमाने की सियासत फलेगी फूलेगी एक दिन उसका सच भी आम जन जीवन जान लेगा मगर तब सियासत करेगी यह यक्ष सबाल हर सियासत मे लीन व्यक्ति को जहन मे रखना चाहिए । बैहतर हो कि समय रहते सेवा कल्याण के सामर्थ को संघर्ष का अखाड़ा न बनने दिया जाये क्योकि हमे यह नही भूलना चाहिए कि इस आजादी की हमारे अपनो ने कभी बड़ी कीमत चुकाई है सिर्फ सिर्फ मानव , जीव , जगत कल्याण के लिये कहते है जीवन मे अपेक्षा कर्म से करनी चाहिए जन आकांक्षाओ से नही क्योकि वह तो बैसै भी आदि अनन्त से आकाक्षी रही है और कल्याण की मोहताज सो मानव धर्म भी इसी का हामी रहा है काश इस सच को हमारे सियासत वीर समझ पाये तो यह मानव जगत की बढ़ी उपलब्धि होगी । 


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