ईमान की होली में हाथ सेकता इन्सान , अर्थ के लिये अनर्थ
समृद्ध जीवन को सिसकते लोग , महात्वकांक्षा हुई बैलगाम
व्ही. एस. भुल्ले
29 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
कहते है इस अर्थ युगी कलयुग मे जो हो जाये वह कम है मगर जिस तरह से ईमान की धधकती होली मे हाथ सेकने की संस्कृति परवान चढ़ी है वह भले ही हालिया फलित न हो मगर इसके दूरगामी परिणाम बहुत भयाभह रहने बाले है । क्योकि जिस तरह से अर्थ के लिये अनर्थ समाज मानव जीवन मे पनप रहा है वह स्वार्थ तो पूरे कर सकता है मगर समृद्ध जीवन किसी को भी मुहैया नही करा सकता क्योकि अपने ही राज मे जिस तरह से आम लोग समृद्ध जीवन को तरस रहै है वह किसी से छिपा नही जिसके लिये उन्है ही जिम्मेदार करार दे देना कोई नई बात नही मगर आज के जीवन का सच अब यही रह गया है । कहने को लोक जन कल्याण कारी सत्ताये है और सेवा भावी सियासत जिनके कंधो पर यह लोकतंत्र टिका है । और लोकतंत्र मे को अंगीकार करने बालो का विश्वास टिका है । मगर दुर्भाग्य कि सत्ता सियासतो के लाख चाहने के बाबजूद आज तक सिर्फ एक दूसरे को कोसने के बजाये सर्बकल्याण का समृद्ध मार्ग प्रस्त नही हो सका । जो 70 बर्षो की आजादी और महान लोकतंत्र के रहते अक्षम असफल ही रहा अब कारण जो भी रहै हो मगर परिणाम तो आज यही जुगाली करते है कि सेवा कल्याण का कार्य पूर्ण मनोयोग से नही हो सका । अब इस सबाल पर तर्क कुतर्क हो सकते है व्यक्त भावना की मजम्मत हो सकती है मगर इस सच को नकारा नही जा सकता । कभी सत्ताओ का अंहम अहकार तो कभी व्यक्तिगत पद सौपानो का अहंकार कही न कही सर्बकल्याण के मार्ग की बाधा बनता रहा मगर जब से सत्ता सियासत मे ईव्रिस का आगमन क्या हुआ मानो अहंम अहंकार की दिशा ही पलट गई बैसै विद्ववान कहते है कि अहकार भी दो प्रकार का होता है एक वह जो साधन संपन्नता के कारण होता है तो दूसरा अहंकार वह होता है जिसमे क्रूरता छिपी रहती है और यही अहंकार अपनी महात्वकांक्षा पूर्ति करने के लिये या अपने अहम को बनाये रखने के लिये क्रूरता करने से भी नही चूकता जो समुचे मानव समाज के लिये कलंक और मानवीय कृतज्ञता श्राफ कहा जा सकता है मगर मानव जीवन ही नही इन्सान और इन्सानियत भी इससे जब तब दो चार होती रही है । आज भी जिस तरह से महात्वकांक्षाये बैलगाम है और आम जीवन कलफने बिलखने पर मजबूर है उनका कल्याण चद निवालो या उसे मनमर्जी करने की छूट देने से नही हो सकता आज कोई नोट तो कोई वोट के लिये ईमान की होली जला मुफलिसी की ठंड भगाने हाथ सेकने मे लगा है इससे निश्चित ही मानव जीवन मे कुछ लोगो की ठंड तो दूर हो रही है मगर जो इस ठंड मे नंगे भूखे ठिटुरन मेहसूस कर रहै है उनका क्या जो कल्याण के पात्र है जिनकी सेवा मे न जाने कितनी सत्ताये देखते देखते स्वाहा हो गई मगर हालात नही बदले इसलिये जरूरी है कि डाटने बांटने के कल्याण से इतर सत्ताये सतत सत्ता सुख का मोह त्याग सर्बकल्याण मे जुटे जो सिर्फ महान संस्कृति और संस्कार कि छत्रछाया मे शिक्षा ही दे सकती है वह भी वह स्वाभिमानी शिक्षा जिसके गर्भ से ज्ञान विज्ञान सैद्धान्तिक व्यवहारिक रूप मे जन्म लेते है । मगर रास्ता कठिन है सपाट है रपटन भरा है जिस पर चले कौन आज यही सबसे बड़ा यक्ष सबाल आम समझ रखने बाले इन्सान के सामने है मगर स्थापित सिस्टम की उची उची दीवारो को कौन लांधे कौन हनुमान बने जो इस मानव जीवन की दशा और दशा सुधार सके । लगता है यह पवित्र का किसी मानव के हाथो से तो होने से रहा मगर उम्मीद तो की ही जा सकती है । जय स्वराज ।

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