ढाई अरब नीलम और साग सब्जी की हाॅट ........? तीरंदाज


व्ही. एस. भुल्ले 


भैया - श्रावण मास में भगवान भोले नाथ के जयकारे के बीच तने कै अर्र बर्र बोल रिया शै के थारे को सच्ची शक्ति भक्ति मे डूबने का समय नही मिल रिया शै जो तने नीलम और सब्जी भाजी की बात कर रिया शै दनादन झमाझम उड़ रही है और साक्षात भोले नाथ की कृपा बरस रही है । 

भैयै - काड़ू बोल्या लंका मे ढाई अरब का नीलम मिला है जिसका भाव भी चोटी के जौहरियो द्वारा हाथो हाथ फिक्स कर दिया है अगर खबर पक्की है तो इतने बड़े साइज का तो आज तक म्हारे आॅगन मे कांच का टुकड़ा तक नही निकला है भले ही म्हारे प्रदेश मे हीरो की खान हो मगर आज तक ऐसा भाग्य किसी का नही चमका है । जो लंका के काॅलंबो मे चमका है । 

भैया - कै थारे को मालूम कोणी कभी म्हारे संयुक्त प्रदेश मे भी बैलाडीला की डील हुई थी मगर हीरो की मैग्जीन उपर ही होने के बाबजूद किसी को धेली भी नही मिली थी वो तो राजा कि कृपा रही कि बात बैलाडीला मे ही दफन कफन हो ली अगर बोली सब्जी भाजी हाॅट मे लग जाती तो मिटटी भी आज सोना उगल रही होती । 

भैयै - थारे मे यही तो खराबी है जो तने हीरो की तुलना सब्जी भाजी से कर डाली है ये अलग बात है कि कहाबते हुआ करती है मगर सौ आने सच हो ऐसा भी नही हुआ करती 

भैया - काड़ू तो बोल्या कि हीरा तहां न खोलिये जहां सब्जी की हाॅट सो मने तो लंका की बात कर रहा हुॅ और पुरूषकारो की पूर्व संध्या पर अपन हुनर हीरे की बात कर रहा हुॅ । मगर म्हारे जौहरी तो मुॅह मे मिश्री दबा उफ तक बोलने तैयार नही ऐसे म्हारी बात कौन करेगा समुचे विश्व मे अपनी संस्कृति कला व्यंजनो उत्पादनो का परचम लहराने बाली इस कौम की बात कौन करेगा । आज भी म्हारा हुनर किसी से कम नही मगर हीरो की पहचान उनका सटीक मोल कौन लगाये या तो एक अलग संस्कृति संस्कार सर चढ़कर बोल रहै है और खुद ही अपनी कब्र खोद कफन दफन का इन्तजाम कर रहै है । 

भैयै - मुये चुप कर इस पावन मास मे तने कफन दफन नही नये सृजन की बात कर और प्राक्रतिक सौदर्य बड़ाने मे मानव होने के नाते अपना योगदान कर इतने पर तो थारी चल जायेगी वरना थारी बोली भी इसी हाॅट मे भटे भाजी के भाव लग जायेगी । 

भैया - मने जाड़ू मने तो बैसै भी भटे भाजी के भाव बिच रहा हुॅ क्योकि न तो अब तक कोई जौहरी मिला न ही हीरा खोज कम्पनी सो मने तो एक्सपो का इन्तजार कर रहा हुॅ मगर म्हारे अर्गजो का खुला कहना है कुछ नही मिलेगा मानव जीवन तो त्याग का आग्रही होता है सो मने तो बैसै भी कोई मुगालता नही मगर म्हारे हुनर का कै करू जो बार बार म्हारे को कचोटे जा रहा है और अपनी दुर्गति पर आंसू बहा मुझे भी रूला रहा है । म्हारे चिंता म्हारी नही म्हारे चिंता तो म्हारे गौवंश की दुर्दशा की है आखिर उन्है कब न्याय मिलेगा उनकी त्याग तपस्या पर मोन मानव कब मुॅह खोलेगा नीलम हीरे तो अपना मोल पा जायेगे मगर म्हारे गौवंश कब अपना खोया अधिकार छीनी संपत्ति को कब हासिल कर पायेगे । गर ऐसा हो पाया तो यह मानव जीवन धन्य हो जायेगा कम से कम इस महान भूभाग पर मानव तो श्रापित जीवन से मुक्त हो जायेगा । जय स्वराज । 


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