सुदृड़ होती , सियासी संस्कृति , बैचैन हुये स्वार्थवत संस्कार


नये ककहरे से सत्ता ढोने की कवायद 

युवाओ पर भरोसा , समझ बूझ , सामर्थ पर विश्वास 

वीरेन्द्र शर्मा 

8 जून 21 विलेज टाइम्स समाचार म.प्र. 


काॅफी जददोजहद के साथ आखिरकार केन्द्रीय मंत्री मंडल मे फेरबदल हो ही गया जिसमे सरकार के नेतृत्व ने कुछ पर विश्वास व्यक्त कर पुरूषकृत कर उनको प्रमोशन किया तो कुछ को बाहर का रास्ता दिखा दिया मगर जिस ककहरे के साथ सत्ता ढोने की कवायद तेज हुई है उसके परिणाम तो आने बाले समय मे देश के सामने होगे मगर जिस तरह से वर्ग विशेष के साथ समझबूझ सामर्थ पर विश्वास कर युवा चेहरो को मौका मिला है पुरूषार्थ प्रदर्शन कर सेवा कल्याण विकास मे योगदान का वह अवश्य काबिले गौर है और सम्मभवतः यह देश की सियासत मे सत्ता मे भागीदारी देने का तीसरा मौका है ऐसे लोगो को जिन्होने सपने मे भी कभी ऐसा नही सोचा होगा कि वह भी कभी एक ऐसी सत्ता के भाग होगे जिस पर इतिहास रचने का दबाब है । शायद इसलिये ही पुरानी परम्पराओ को दरकिनार कर मौजूद सियासत को एक ऐसा संदेश देने का प्रयास हुआ है जिससे स्वार्थवत सियासत खासी अचंभित है । निश्चित ही इससे इतना तो तय है कि भारतीय सियासत मे सुदृड़ सियासी संस्कृति को खासा बल मिलेगा । और यह किसी भी समृद्ध सियासत मे ऐसा होना भी चाहिए जिससे लोगो के यह मुगालते दूर होते रहै कि सियासत अब सत्ता भोगी प्लेट फाॅर्म नही रहा बल्कि सत्ता सिर्फ और सिर्फ सेवा कल्याण के क्षैत्र मे सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ करने का माध्ययम बन चुका है । ये अलग बात है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था मे सियासत कि अपनी बैबसी हो सकती है मगर सेवा कल्याण से समझौता किसी के भी हित मे नही होता । मगर जिस नये रथ पर सबार सारथी जिन सिपहसालारो के साथ मैदान फतह करने का मोर्चा लगा रहा है और जिस रणनीत के साथ अब लश्कर बढ़ने तैयार है हो सकता फतह संभव हो मगर यह इतना आसान भी नही क्योकि जिस मैदान मे विरोधी दलो के साथ दो दो सियासी हाथ होना है वह चारो दिशाओ से खुला है और जंग मे कौन किसके साथ होगा यह भी अभी तक तय नही सो खतरा तो चहुॅओर बरकरार है ऐसे मे बड़ा विश्वास सिपहसालारो के आलावा और किसी पर करना बड़ी भूल हो सकती है क्योकि पश्चिम बंगाल के परिणाम सामने है इसलिये जरूरी है कि जंग को बजाये किसी ओर के भरोसे छोड़ने से बैहतर होगा कि नेतृत्तव सीधा हो तभी प्रस्तावित लक्षय हासिल हो सकते है । नेतृत्व को यह नही भूलना चाहिए कि विरोधी अब पहले से कही अधिक चैकन्ने और साबधान है । और उनकी कोसिश होगी आने बाली जंगो मे करो या मरो सो जरा सी भी चूक बर्षो की तपस्या को और इस देश के मान सम्मान को बड़ी चोट पहुचा सकती है । इसलिये साबधानी और सामर्थ अनुसार विजय के लिये हमले की रणनीत होना चाहिए । क्योकि आगे से जो भी सियासी युद्ध होगे उसमे चुनौती सिर्फ अन्दर ही नही बाहर से भी होगी एक ओर जहां वैश्विक नैतिकता का पालन करना होगा तो दूसरी ओर उन लोगो का भी साथ लेना होगा जिनके कल्याण के लिये बर्षो से मानव जीवन संघर्षरत है और अनगिनत कुर्बानियां भी हुई है उस विरासत को बचाना और फतह सुनिश्चित करने के लिये जब नई नई रणनीत और सामर्थ अनुसार प्रदर्शन नही होगा तब तक बात अधुरी रहने बाली है क्योकि कहावत तो यह है कि एक चना भाड़ नही फोड़ सकता है मगर श्रेष्ठजनो का मानना है कि आकार भले ही चने सा हो अगर उस आकार मे विवेक सामर्थ हो तो वह भाड़ ही नही पूरे के पूरे भाड़खाने को उड़ा सकता है बात सिर्फ समझ की है मन के बजाये चित कि है जिसने भी इस महान भूभाग पर चित अनुसार पुरूषार्थ किया उसे इतिहास ने आजतक सजोके रखा है न देश मे रोजगार कोई समस्या है न ही सामर्थ सिद्धि सबाल सोच और प्रयास का है विद्या अनाथ जब तक विद्या को मुकाम नही मिलेगा तब तक सारे लक्ष्य अचूक रहने बाले है । कहते है जो राजा प्रजा विद्या ज्ञान विज्ञान से अछूता रहता है वह जनसेवा मे कंगाल भी हो जाये तो भी उसे जीवन की सार्थकता उसकी सारर्थी बनने तैयार नही होती न ही उसका जीवन उसे मानव होने के नाते वह यश दे पाता है जिसका वह हकदार होता है इसलिये बदलाव के जुनून के बीच चित अनुसार उस लक्ष्य मौजूद संसाधनो पर विचार अवश्य करना चाहिए । फिर वह मानव संसाधन हो या फिर प्राक्रतिक जय स्वराज । 


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