विश्वास की कसौटी पर आशा अकांक्षाओ का दिवाला
निष्ठा को लेकर उठते सबाल घातक
वीरेन्द्र शर्मा
31 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
अर्थ अभाव में माखौल बनते सत्ता , सौपानो की बैबसी सच जो भी हो मगर वह निर्देाष सिद्ध हो सर्वजनिक जबाबदेहियो के बीच यह संभव नही क्योकि जुनून के बीच जिस तरह से आशा अकांक्षाओ का दिवाला निकल रहा है उससे निष्ठा पर संदेह होना स्वाभाविक है और यह सही भी है कि जो विश्वास निष्ठा की दम पर सत्ता , सौपानो आम जन के बीच कायम किया था वह सतत सत्ता की महात्वकांक्षा मे स्वाहा होता चला जा रहा है जिसके परिणाम भले ही भबिष्य के साक्षी सिद्ध हो मगर यह उस लोकतंत्र के लिये कतई लाभप्रद नही रहने बाले जिसको लोगो अंगीकार कर अपने वोट की ताकत से उन सत्ता ,सौपानो सक्षम बना अचूक शक्ति प्रदान की मगर आज जिस तरह से अर्थ अभाव मे यह संस्थाये स्वयं बैबस सिद्ध कर रही वह कैसै स्वयं को लोक जन कल्याण मे सिद्ध करेगी तंत्र जो भी हो या रहै मगर जीवन अमूल्य है जो हर व्यक्ति को एक ही बार मिलता है खासकर मानव जीवन जिसके कंधो पर समस्त जीव जगत के कल्याण की जबाबदेही होती है अगर उसका ही जीवन अभावग्रस्त कंटक पूर्ण हो जाये तो वह कैसै मानव जीवन की उपायदेयता सिद्ध कर पायेगा कैसै मानवीय संपदा प्राक्रतिक संपदा से सामजस्य बैठा अपने कर्तव्य का निष्ठा पूर्ण निर्वहन कर पायेगा आज जब ग्रेजुऐट पोस्ट ग्रेजुऐट गार्ड या चतुर्थ श्रेणी की नौकरियो मे आवेदन करते है और विभिन्न विधाओ मे पारंगत युवा आवारा घूमते है या कोन्ट्र्क्ट बैस पर रोजगार पा स्वयं को धन्य समझते है तो निश्चित ही चिंता होती है दुख और दर्द भी होता है कारण बजाये व्यवस्था सुधारने के सौपानो को प्रयोगशाला बना उन्है उनकी असल पहचान उनके पुरूषार्थ से बन्चित कर उन्है सबालो के दलदल मे धकेल देना कहा की सेवा समझदारी कही जायेगी मगर सब कुछ सेवा कल्याण के नाम चल रहा है एक चोरी रोकने जगह जगह पहरा खड़ा किया जा रहा है । मगर निश्चित तौर पर कौन जबाबदेह होगा यह सिद्ध नही हो पा रहा है । अगर यो कहै दोनो ही स्थितिया स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओ के घातक है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी । जिस तरह से मेघनाथ के वद्य पर रावण को अहंकार बस यह विश्वास लाख समझाने के बाबजूद भी नही हो रहा था कि तुम्हारा अर्थात लंका का अन्तिम कुलदीपक तुम्हारे अहंकार और काम के चलते बुझ चुका है ठीक उसी तरह सत्ता पिपाशुओ को यह नजर न आये कि सत्ता सौपानो से विश्वास का जो कुल दीपक था वह अब बुझ चुका है अगर अधी भी मंदोदरी की भूमिका मे आशा आकांक्षाओ बिलाप करने पर बैबस मजबूर है वह विनाश का कारण न बन जाये आज सभी के लिये यह समझने बाली बात है क्योकि लोकतंत्र के प्रति जबाबदेही उन लोगो की अधिक है जिन्होने इसे अंगीकार कर उन पद सौपानो को स्वीकार किया जो जन कल्याण मे उत्तरदायी है उन्है संचालित करने संरक्षित करने बाले जो भी हो मगर निष्ठा से घात किसी के भी हित मे नही सभी को एक साथ मिल कर महलो , बंगलो ,कोठी , झोपढ़ पटटी मे रहना है इसलिये सबाल यक्ष है कही ऐसा न हो कि कही बहुत देर हो जाये फिर कोई रास्ता ऐसा न रहै जिसमे कोई सुधार या पश्चाताप की संभावना शेष न रहै । जय स्वराज ।

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