स्वार्थ के लिये सामर्थ को कलंकित करते तथाकथित वीर


अपनो के बीच बिलबिलाता आम जीवन 

सत्य से विमुख सामर्थ शालियो का पुरूषार्थ , कुल कौम , भावी पीढ़ी ही नही , अपने पूर्वजो की महान कीर्ति , यश , ऐश्वर्य , त्याग , तपस्या को भी पीढ़ी दर पीढ़ी कलंकित करता है । 

व्ही. एस. भुल्ले 


18 जुलाई 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

जीवन की बैहतर समझ के साथ जीवन मूल्य सिद्धान्तो के लिये जीवन जीने बालो का आज सबसे बड़ा दर्द यह है कि अब न तो सत्ता न ही सियासत मे और न ही मौजूद समाज संस्कृति संस्कार के बीच आज उनकी कोई भूमिका शेष रही न ही उन्है सुनने समझने मे किसी को कोई दिलचस्वी रही यह आज के जीवन का कटु सत्य है । फिर भी न उम्मीद होना जीवन से द्रोह ही कहा जायेगा । इसलिये मानव धर्म के पालन मे मानव के रूप मे मानव की निष्ठा मानव धर्म की रक्षा उसके संरक्षण मे होना चाहिए मगर दुर्भाग्य की आज तथाकथित सामर्थशालियो की जमात अपने अपने स्वार्थो के सामर्थ को ही कलंकित करने मे जुटे है जो ठीक नही क्योकि आज आम जीवन अपने नैसर्गिक हक को हासिल करने सरेयाम बिलबिला रहा है मगर बैजान सत्ता संसाधनो मे सुनने बाला कोई नही न तो वह मानव संसाधन ही समस्या समाधान मे देवदूत साबित हो पा रहै है और न ही जीवन कल्याण सेवा के लिये अलाउददीन का चिराग बनी वह हाईटेक तकनीक जिसके कंधो पर सबार सत्ताये जन जीवन समस्याओ की उफनती नदी को पार कर खुद के पाप धोना चाहिती है । एक नमूना यह भी है कि लाइट कही की भी जाये अब शिकायत तब दर्ज होगी जब आपके पास हजारो रूपये का मोबाइल हो या फिर घर मे कम्पियूटर के साथ उसे चलान बाला दक्ष व्यक्ति होना चाहिए । जिस पर काॅल करने के बाद आवाज सुन सकते है क्या आप मुझे सुन पा रहै है , कुछ सेकिण्ड का विराम अगर आप सुन पा रहै है तो रियेक्ट करे तत्पश्चात आवाज आती है समय देने के लिये धन्यबाद तो कभी कभी आप ऐसे भी शिकायत कर सकते है कि आप फोन लगाते ही सुनेगे अभी हमारे अधिकारी व्यस्थ है । अब वो कब तक व्यस्त है यह बताने बाला कोई नही यह वो सत्य है उस अलाउददीन की चिराग बनी उस हाईटेक तकनीक का जिसकी कुतज्ञता पर सत्ता मे सने लोग स्वयं को कृतज्ञ समझने मे कतई चूक नही समझते जन धन करोड़ो रूपया फूक इस बैजान तकनीक को समाधान समझने बालो शायद यह भान नही कि लोग कितने परेशान है आज स्वयं को कोसने के अलावा उन बैबस मजलूम लोगो के पास ऐसा कोई सहारा नही जिसे वह अपना दुख दर्द सुना सके । सतत सत्ता का जुनून स्वार्थवत भाव स्वयं सिद्ध करता है क्योकि समय न तो न्योत्ताओ के बस मे रहा न ही कभी किसी व्यक्ति के भ्रम के सहारे बैबसी की लूट छणिक सुख तो प्रदान कर सकती है मगर सत्य से जीवन मे सामर्थ की विमुखता पूर्वजो की यश , कीर्ति , त्याग , तपस्या , कुल कौम सब को कलंकित करती है इतिहास आज हजारो सेकड़ो बर्ष बाद भी उन लोगो का भी है जिन्होने मानव धर्म रक्षा मे अपना नाम दर्ज कराया और ऐसे लोगो का इतिहास भी है जिन्होने पुरूषार्थी सामर्थशाली होते हुये भी कुल और कौम दोनो को कलंलित कराया मगर असल वीरो ने कभी अपने पूर्वजो कि कीर्ति को कभी कलंकित नही कराया । सत्ताये अनादिकाल से मानव धर्म रक्षा का कार्य करती रही है मगर आज जो कृत्य मानव जीवन के रूप मे सत्ता सौपानो मे चल रहै है वह कभी कल्याण कारी नही हो सकते क्योकि श्रेष्ठ साध्य की प्राप्ति तभी हो सकती है जब साधन पबित्र हो अगर सत्ताये आज व्यवस्थागत डर से डर कर साधनो की पवित्रता से समझौता कर रही है तो पक्का मानिये परिणाम आज और न कल कभी भी सार्थक नही रहने बाले फिर सत्ता मे काबिज व्यक्ति , समूह , संस्था , संगठन की प्रमाणिकता जो भी हो वह कभी सफल नही हो सकते । क्योकि यह प्राकृतिक ही नही नैसर्गिक सत्य भी है कि जब भी समझौता होता है तो उसके परिणाम अवश्य प्रमाणिक रूप से जीवन को प्रभावित करते है और प्रमाण स्वरूप लोगो के सामने होते है फिर नवजीवन हो या जन जीवन । मगर बिमुखता के अथाय सागर मे समाधान ढूढती निष्ठ जीवनो की टोली कितनी सफल होगी यह तो आने बाला ही समय तय करेगा मगर इतना तो तय है कि अगर लोगो की बैबसी की लास पर बैठ इसी तरह सेवा कल्याण के भण्डारे चलते रहै तो एक दिन समृद्ध जीवन अगर शमसान नजर आये तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होनी होना चाहिए । जय स्वराज ।  


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