भटकाव में संघर्ष , कल्याण से दूर कृतज्ञता ,मेरे 50 बर्ष


स्वराज से सत्ता या सत्ता से स्वराज सबाल यक्ष है 

समृद्ध जीवन का संकट बरकरार 

व्ही. एस. भुल्ले 


14 अगस्त 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

यर्थात तो वही है जो था , है , और रहेगा मगर संघर्ष के भटकाव मे जो न हो सका वह है , कल्याण से दूर कृतज्ञता जो आज भी अर्थहीन सिद्ध हो रही है । अनुभव के या जीवन के 50 बर्ष यही एहसास अनुभूति का आभास कराते है । फिर भी जो यक्ष सबाल जीवन की समृद्धि खुशहाॅली को लेकर सेकड़ो बर्षो से जीवन मे संघर्षरत है वह यह कि स्वराज से सत्ता या सत्ता से स्वराज यह सबाल और संकट जीवन मे आज भी बरकरार है आज के ज्ञान विज्ञान से अभिभूत जीवन , जीवन कल्याण और समृद्धि खुशहाॅली मे कितना संक्षम असरदार है कहने की जरूरत नही क्योकि वह तो आज हर जीवन के समक्ष स्पर्शी है वह एहसास है उस सुख दुख का जो जीवन को नितरोज ही किसी न किसी रूप मे अपनी उपस्थिति का एहसास कराता रहता है । अमृत महोत्सव का वक्त है और इस महान भूमि पर सजृन के विधान को त्याग विधि के विधान को अंगीकार करने बाले महानुभावो के लिये परायी सत्ता से मुक्त होने का शुभ दिन जिसके लिये लोग इस महान मातृभूमि के मान सम्मान स्वाभिमान के अपने मान सम्मान स्वाभिमान की परवाह किये अपना सब कुछ न्यौछावर कर अपने जीवन की आहूतिया देते रहै आज उनको भी याद करने का दिन भी है क्योकि यह वह समृद्ध भूभाग रहा है जहां कोई न कोई अक्रांता हमलावर इसकी समृद्धि खुशहाॅली इस महान भूभाग का गुरूर इसकी सम्पन्नता खुशहाॅली देख आता जाता रहा है मगर इस महान मिटटी के लाल , लाडलियो ने अपनी मात्रभूमि को , अपनी संस्कृति को न तो कभी निराश किया न ही इसके महान पुरूषार्थ को बांझ होने दिया । विश्व मे शायद ही ऐसा कोई समृद्ध भूभाग रहा हो या हो जहां प्राकृतिक संपदा संस्कृति ज्ञानोमुखी शिक्षा सामर्थ पुरूषार्थ की प्रचूरता रही हो या आज भी हो मगर यथार्त सत्य हमारा आज सबके सामने है । समृद्धि का संकट आज भी बरकार है । वोट नीति की आढ मे स्वयं के सामर्थ पुरूषार्थ को कलंकित करने बाली सियासत की बैबसी उसका अहंकार उसका अज्ञान इतना प्रबल है कि वह सत्ता से इतर न तो कुछ सोच पाती है न ही उसके निदान के हल ढूढ पाती है बल्कि अगर यो कहै की सेवा कल्याण के नाम रूमाल झपट मे पारंगत आज की सियासत लोकजीवन , जनजीवन के अर्थ खो चुकी है तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी । मगर कोसिशे अवश्य होती रहना चाहिए । वह अदनी सी कोसिशे ही जीवन मे रही है जिन्होने अपनी सिद्धता जीवन और सर्बकल्याण मे सिद्ध की है इतिहास गबाह है कि इस महान मात्र भूमि का न तो कभी विश्वास हारा न ही सामर्थ पुरूषार्थ समृद्ध इस महान भूभाग का दुर्भाग्य समय वे समय यह रहा है कि सर्ब कल्याण का भाव स्वार्थ वत जीवन के आगे यह सिद्ध करने मे बार बार असफल रहा कि जीवन के सच्चे मायने क्या है असल मे जीवन का अर्थ क्या है वह भी तब की स्थति मे जब की उसे बखूबी ज्ञान होता है कि जीवन का सही अर्थ सर्बकल्याण है मगर सबाल वही कि स्वयं से निकलकर सर्बकल्याण मे पुरूषार्थ कौन करे कौन स्वयं का जीवन दाॅव पर लगा ओरो जीवन समृद्ध खुशहाॅल करे । जिस जीवन को लोग जी लेना चाहते है असल वह वो जीवन है जिससे न तो उसे कुछ हासिल हुआ न ही आने बाली पीढ़ियो को कुछ हासिल होने बाला है सिबाय संघर्ष उस अशांति के जिसके लिये जीवन , जीवन भर भटकता रहता है । फिर इसके लिये वह कैसे दोषी हो सकते है जिन्है ज्ञान ही नही और जो समृद्ध जीवन को ही एक बड़ी समस्या मान जीने मे लगे उनके लिये तो जीवन सिर्फ जी भर कर जी लेने सबाल है और ज्ञान अध्यात्म और भौतिक सुख सुबिधाये समृद्ध जीवन का मार्ग है फिर वह कैसै भी हासिल हो अर्थात जंगल विद्या मे जीवन जी लेने का गुर जो स्वयं ही मानव जीवन के लिये अपने आप मे एक श्राफ है । शायद शैली मे जीने मरने बाले समझ समझा पाये जिनके पास है तो यह अमृत महोत्सव की बड़ी सफलता और मौजूद मानव जीवन की बड़ी सिद्धता होगी जय स्वराज । 

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