जबाबदेही के अभाव में जीवन बना जीवन की दुश्मन
विधि से अनभिज्ञ जीवन को दण्ड की दरकार
सीधी जबाबदेही से मुक्त बड़े वर्ग को लाना होगा दायरे में
बाढ़ भीषण बारिस ने खोली कर्तव्य विमुखता की पोल
सीमेंट , सरिया , रैत गिटटी मिटटी की गुणवत्ता की हो जांच
वीरेन्द्र शर्मा
10 अगस्त 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
म.प्र. के ग्वालियर चंबल के कई जिलो मे हुई भीषण बारिस , बाढ़ की तबाही के पद चिन्ह मौसम खुलने बारिस रूकने साथ कुछ ज्यादा स्पस्ट नजर आये । मगर बारिस के दौरान जो तबाही आम परेशानी पीढ़ा आम लोगो ने बच्चो ने झेली है जो कुछ इस बारिस बाढ़ की विभीषिका मे लोगो ने गबाया है उसकी पूर्ति शायद इस जीवन मे हो पाये ये अलग बात है राहत बटेगी संवेदनाये मिलेगी नगद राशि मिलेगी मगर इस बीच उसे उसका खोया वह वैभव जो उसने अभावो मे जिन्दा रह खुद के पुरूषार्थ से खड़ा किया था जो सुकुन शान्ति उसने अपना सब कुछ लगाकर हासिल की थी वह शायद उसे हासिल न हो पाये । कारण स्पष्ट है प्रकृति तो अपना कर्तव्य निर्वहन पूरा करने समय वे समय अपना काम करती है मगर मानव जीवन मे जिस तरह से विधि या विधान को मानने , अंगीकार करने बालो के बीच कर्तव्य विमुखता बढ़ी है उसी का परिणाम है कि जनधन से तैयार जनधन की पगार पर तैनात लोगो ने अपनी जबाबदेही ठीक से नही निभायी और करोड़ो की परिसंपत्ति तास के पत्तो की तरह ढह गई पुल पुलिया सड़के बाढ़ के वेग मे नही टिक सके और वह गये , तबाह हो गये इतना ही नही भारी बारिस मे लोगो के घरोदे उजड़ गये अब अगर कुछ शेष बचा है तो पीढा रूधन और अफसोस या फिर जबाबदेहो को हटाना लगाना घोषणा आश्वासन तथा कभी खत्म न होने बाली वह उम्मीद जिस पर जीवन आज भी जिन्दा है या फिर उसका वह आत्म विश्वास पुरूषार्थ जिसके बल वह शेष जीवन को समृद्ध खुशहाॅल बनाने संघर्ष करने मे सारथी बन सहयोग करेगा । मगर इतनी बढ़ी तबाही पर जबाबदेहो से सबाल न हो उन्है साबासी दण्ड ने मिले तो यह जीवन के साथ जीवन की बैमानी होगी साबासी दण्ड सिर्फ उन लोगो को ही न मिले जो जनधन से मिली चाकिरी के चलते जबाबदेह है दण्ड विधि संबत उन लोगो को भी मिलना चाहिए जो नीति बना आगे बढ़ उन संरचनाओ को भगवान भरोसे छोड़ नई नई अधोसंरचनाओ के निर्माण तथा अनुबंध के आधार पर लोहपुरूष की तरह विकास परौसना चाहते है और घटिया विकासो के फीते थोक बन्द सिला पटटो के लोकार्पण के माध्यम से करना चाहते है योजना बनाने से लेकर प्राक्कलन , मुल्याकंन , बिल बनाने से लेकर , गुणबत्ता परीक्षण सभी कुछ तो अनुबंध के आधार पर हो रहा है तो फिर तैनात जबाबदेह मानव कैसै सीधे तौर पर जबाबदेह हो सकता है । जबाबदेह तो वह नीति नियोक्ता भी है जिन्ह स्वार्थबस केन्द्रिय करण का भूत सबार है सच तो यह है कि जनधन की पगार पर तैनात लोगो की तो आढ़ है असल दोषी तो भोपाल मे है उनके खिलाफ सख्त विधि संबत कार्यवाही होना चाहिए न कि बगैर बजट आबंटन के इतने बढ़ी संरचनाओ के लिये तैनात लोगो पर आज जो कार्यवाही कर जबाबदेह लोग अपनी खाल बचा कार्यवाही का स्वाग रच रहै है उन्है न्याय सिद्धांत की अनदेखी नही करनी चाहिए । क्या यह निविदा स्वीकृत करने बाले नही जानते कि शासन के वरिष्ठयंत्रियो द्वारा तैयार कार्य की निर्धारित दर से 30 - 33 प्रतिशत कम दर पर कैसै निर्माण कार्य हो सकता है फिर इस दर के साथ उसे लगभग 7 प्रतिशत कर भी देना होता है क्या 40 प्रतिशत कम दर पर गुणवत्ता पूर्ण कार्य हो सकता है इसके अलावा निविदा स्वीकृति से लेकर मूल्यांकन और भुगतान तक कि मशक्कत अलग जिसका खर्चा भी लगभग 10 फीसदी हो सकता है ऐसे मे या तो दर निर्धारित करने बाले यंत्री नही या फिर कार्य स्वीकृत करने बाले यंत्री नही सच क्या है शासन सरकारो को जनता को अवश्य बताना चाहिए और जनता को भी पूछना चाहिए कि ऐसा क्यो ? कहते है राजकोष की बर्बादी या लूट सबसे बढ़ा किसी व्यवस्था मे सबसे बड़ा अपराध रहा है राजतंत्र मे तो इसे राष्ट्र्दोह तक माना गया है मगर लोकतंत्र मे यह इसे संज्ञा दी जा सकती है यह भी जबाबदेहो को तय करना चाहिए । क्योकि पहली ही बारिस मे जो तबाही आम जीवन ने जन संपत्ति की जो देखी वह बिल्कुल भी क्षमा योग्य या सिर्फ स्थांनन्तरण तक सीमित नही रहनी चाहिए क्योकि निलंबन , स्थानान्तरण इतनी बढ़ी तबाही का दण्ड नही हो सकता है यह वह जनधन था जो कर्तव्य विमुखता की बाढ़ मे बहा है जिसमे से आधे से अधिक आज भी सस्ते राशन ,स्वास्थ सेवा शुद्ध पेयजल और बटने बाली राहत के मौहताज है । क्योकि अगर मानव जीवन ही मानव जीवन उसके धन को धारण करने बाला बन जायेगा तो फिर कैसै मानवता बचेगी और कैसै मानव कहलायेगा । क्या अन्तर रह जायेगा इस या उस जीवन मेे जिसे किसी भी सभ्यता मे सभ्य नही कहा गया । आज सभी के लिये यह समझने बाली बात होना चाहिए । मानेगा तो कोई नही फिर भी बात रखने मे कोताही नही होनी चाहिए यही आज के अर्थ युग का कड़बा सच है यही बर्तमान है और भबिष्य कैसा होगा इसका हमे इन्तजार करना चाहिए ।

Comments
Post a Comment