जन जीवन सरोकार , सृजन को चुनौती देता सामथ्र्य
सर्बकल्याण हुआ अनाथ , श्रेष्ठजनो से पुरूषार्थ की दरकार
संघर्ष आदि अनंत है मगर समृद्ध श्रेष्ठ जीवन सीमित
व्ही. एस. भुल्ले
22 अगस्त 21 आज रक्षा बंधन है अर्थात सृजन की श्रेष्ठतम कृति , संस्कार उस महान संस्कृति का दिन है जो श्रेष्ठजनो को मात्र शक्ति की रक्षा उसके मान स्वाभिमान को संरक्षित संबर्धित करने संकल्प समर्पण का दिन है यह आज के परिवेश मे इसलिये भी अहम है क्योकि आज मात्र शक्ति का मान सम्मान ही नही समुचा जन जीवन संकट ग्रस्त हो समृद्ध खुशहाॅल जीवन के लिये संघर्षरत है कारण ज्ञान सृजन से अनभिज्ञ वह भ्रमित सामथ्र्य जो अपनी समझ अनुसार जन जीवन को समृद्ध खुशहाॅल बनाना चाहते न कि जीवन सृजन सिद्धान्त व्यवहार अनुरूप यह व्याधा कोई सीमित भूभाग पर हो या उसका दायरा सीमित हो ऐसा नही बल्कि समुचे जन जीवन से सरोकार रखने बाले हर उस सामथ्र्य के बीच घर कर गया है जिन्होने अपनी श्रेष्ठता पुरूषार्थ से उस सामर्थ को प्राप्त क्या किया जिसका धर्म कर्म सृजन जीवन मे सिर्फ और सिर्फ सर्बकल्याण हो सकता न की स्व कल्याण या फिर स्व, प्रियजनो का कल्याण यही सृजन मे जीवन का श्रेष्ठ सत्य है मगर इस सच से आज असहमति रखने बालो कि संख्या कम हो सकती है मगर मगर उन समृद्ध श्रेष्ठजनो का क्या उन सज्जन पुरूष उन जीवनो का क्या जो जिनका जन्म ही उस श्रेष्ठता को हासिल करने या मृत्यु भी उस श्रेष्ठ कृति को जीवन मे स्थापित करने के लिये होती रही है और ऐसी ही कृतिया आज समृद्ध खुशहाॅल जीवन का इतिहास भी है । मगर जब जब सामर्थ अपनी श्रेष्ठता से दूर हुआ है और सजृन मे उसने समय का सदउपयोग नही किया जन जीवन की दुर्गति ही हुई और पीढ़िया परेशान आज जिस मुफलिसी का शिकार हो सर्बकल्याण अनाथ या खाना बदौसी की चैकट तक पहुच रहा है यह उस सामर्थ पर कलंक और जन जीवन से दुराचार है जिनके कल्याण कि जबाबदेही सामर्थ की ही होती है कि सजृन मे वह एक ऐसा माहौल सजृन मे लगे जीवनो को मिलना चाहिए जो जीवन मे संतुलन के सिद्धान्त का पालन कर अपनी माहती भूमिका कल्याण मे निभाते है । मगर स्वराज से दूर जिस तरह से जीवन जिस स्वकल्याण स्वजनकल्याण की ओर चल पढ़ा है वह न तो सृजन के हित मे है न ही जन जीवन के हित मे बैहतर हो कि श्रेष्ठता अनुरूप पुरूषार्थ का प्रदर्शन हो सभ्यता संस्कृति बोलचाल की भाषा भूभाग क्षैत्र अलग अलग हो सकते खान पान अलग अलग हो सकता है मगर जीवन और उसे जीने की समृद्ध विधि सृजन मे श्रेष्ठतम जीवन का योगदान अलग नही हो सकता न कभी था न ही कभी रहेगा समझ सोच मे अन्तर हो सकता है मगर जीवन मृत्यु का विधान एक है समृद्ध खुशहाॅल जीवन की विधि सिद्धान्त एक है प्रमाण जब जीवन को बचाने समुचे विश्व मे दवा कारगार हो सकती है तो जीवन के सर्बमान्य कृत्य जीवन सृजन समृद्ध करने की कृति एक क्यो नही हो सकती । जो हर जीवन को सीखने समझने बाली बात होना चाहिए जिस तरह से दूध की महत्वता विश्व के किसी भी भूभाग पर जीवन को शक्तिबर्धक के रूप मे है तो फिर सामथ्र्य से भरा समृद्ध जीवन कैसै अपनी विश्वसीनियता खो सकता है । जय स्वराज

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