सजृन सिद्धांत की अनदेखी मानव की बढ़ी भूल
जीवन में कर्म की सिद्धता ही जीवन का अर्थ
व्ही. एस. भुल्ले
23 अगस्त 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
कहते है सृष्टि मे हर जीवन के लिये सृजन सिद्धांत ही वह धुरी है जहां कर्म की सिद्धता और जीवन का अर्थ सिद्ध होता है जो मानव जीवन ही नही हर जीवन की प्रमाणिकता सिद्ध करने मे सक्षम सफल रहता है बात साधारण और असाधारण भी अन्तर सिर्फ समझ और सोच के साथ उस ज्ञान का है जो जीवन का सारथी बन उस जीवन को शूरवीर बनाता है या फिर सिपाही फिर क्षैत्र जो भी हो । आजकल हमारे लोकतंत्र मे स्वयं या समूहगत श्रेष्ठ और सफल बन सत्ता सियासत मे छा जाने का जो सिद्धांत चल निकला है वह फौरी तौर पर भले ही सफल सिद्ध लगे और लोग इस सफलता सिद्धता पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित भी मेहसूस कर सकते है मगर यह जीवन खासकर मानव जीवन की कृतज्ञता का सम्पूर्ण सच नही यू तो लोकतंत्र मे सत्ता का आधार बहुमत होता है मगर जिस अन्दाज मे बहुमत का आधार दलगत होता जा रहा है वह किसी से छिपा नही जो लोकतंत्र की परिकल्पना पर ही सबाल करता नजर आता है । कुछ बर्षो का लेखाजोखा अगर हम ले तो पायेगे की सत्ता मे है विपक्ष का धर्म किसी भी कीमत या स्तर पर जाकर सिर्फ विरोध करने तक सीमित हो चुका है तो वही जो सत्ता मे होता है वह इसे सिर्फ विरोध मान उसकी अनसुनी करने मे ही भला समझते है अब इसके कई सियासी मायने हो सकते है मगर यहां समझने बाली बात यह है कि विरोध के नाम गतिरोध क्यो और जब गतिरोध रोकने की व्यवस्था है तो फिर निर्णयो को लेकर ब्रेक क्यो जब लोकतांत्रिक व्यवस्था मे प्रावधान है कि बहुमत की चुनी हुई सत्ता को सेवा कल्याण मे नये कानून नीतियाॅ बनाने का संबैधानिक अधिकार है जिसके लिये उसे चुना जाता है और विपक्ष अहम मुददो पर इस लिये चुप हो जाता है कि उसे तो जनता ने यह जबाबदेही सौपी है कि हम विपक्ष मे बैठै और सत्तागत गति विधियो पर नजर रखे तथा गलत नीतियो को विरोध के माध्यम से जनता की नजर लाये मगर क्या सदनो मे ऐसा हो पा रहा है यही जीवन और कर्म का दुर्भाग्य है जो सृजन सिद्धांत मे योगदान की सबसे बड़ी बाधा है काश हम या हमारे सियासी लोग इस सत्य को समय रहते समझ पाये तो यह जीवन मे मानव जीवन की कर्म के माध्यम सिद्धता सफलता और जीवन के अर्थ की उपायदेयता सिद्ध हो पायेगी । जय स्वराज ।

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