समृद्ध जन जीवन के संदेश को धिक्कारता सभ्य समाज


ज्ञान विज्ञान की वेदी पर समृद्धि का अनुष्ठान 

बिलबिलाते जीवन को कर्मवीरो की तलाश 

श्रेष्ठ जन जीवन की रक्षा सज्जन शूरवीरो का धर्म 

व्ही.एस. भुल्ले 


30 अगस्त 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

प्रभु आपने जो स्वयं जो संदेश जन जीवन को दिया शायद लोग उसे बिसराते जा रहै है मगर जन जीवन को समृद्ध बनाने ज्ञान विज्ञान की वेदी पर जिस तरह के अनुष्ठान जन जीवन को सृमद्ध बनाने चल रहै है और जन जीवन जिस तरह से बैहाल है कि बिलबिलाते जीवन को अब कर्मवीरो से ही कुछ आस है यू तो अनादिकाल से ही श्रेष्ठ जन जीवन की रक्षा का भार शूरवीरो पर रहा है जिसे अपना श्रेष्ठ धर्म कर्म मान उन्होने अपने बहुमूल्य प्राणो की चिन्ता किये बगैर अपने अपने कर्म और धर्म का पालन किया । मगर आज जब 21बी सदी के सामर्थ पुरूषार्थ से भरे शूरवीरो की बात करे तो परिणाम उतने सुखद प्रमाणिक नही रहै कारण जीवन के मूल को छोड़ समृद्धि की तलाश । आज आपका जन्मदिन है और जान से प्रिय गौवंश का जीवन जन की उपेक्षा का शिकार मगर बिलबिलाते जीवन को आज भी यह भान नही कि उसकी मुफलिसी के पीछे के असली कारण क्या है । मगर है प्रभु सज्जनो की इस निष्ठा और दुर्जनो के अज्ञानी जीवन को माफ करना जो मेहनत कश पीढ़ी चटक दुपहरि मे पुरूषार्थ का प्रदर्शन कर लोग के निबाले का सहारा रही और पीढ़ी दर पीढ़ी जिसने अपने हक का अमृत लोगो की जुबां तक पहुचा जिनका जीवन हस्ट पुष्ट बनाया वह भी बगैर किसी शिकायत के मगर आज उनकी र्दुदशा पर दुख भी है और दर्द भी पहले सत्ता शूरवीरो की गुलाम होती थी तो आज वही सत्ता सामथ्र्यशालियो की चैरी बन जाती है अब ऐसे मे इन बैजुबानो को न्याय कैसै मिले प्रभु आपके संदेश आज अध्यात्म तो धनार्जन सबसे बड़ा ज्ञान विज्ञान हो चुका जिसके रथ पर सबार हो हर जीवन शूरवीर बन सम्राट बनना चाहता है ऐसे मे प्रभु आप से ही बड़ी उम्मीद है इस युग मे मौजूद उस जन जीवन को जिसकी आस्था सर्बकल्याण और सामर्थ अनुसार पुरूषार्थ मे है । समृद्ध जीवनदायनी का हक छीनने बालो को कौन समझाये की इनके जीवन के बगैर जन जीवन अधूरा असाहय है धन संपदा होने के बाबजूद जीवन की समृद्धि से वह अनाथ है । प्रभु सत्ताओ को सदबुद्धि आये या न आये कम से कम आपमे आस्था रखने बाले आपका संदेश कथाओ के माध्यम सुनने पढ़ने बालो में ही आ जाये आखिर इन गुनहगार जीवनो का क्या होगा जो इस जीवन मे समृद्ध विरासत का उधार इस समृद्ध प्रकृति का उधार और अपनी आने बाली पीढ़ी का हक मारकर उन्है बिरासत मे कुछ भी ऐसा छोड़ना नही चाहते जिस वह शर्म की बजाये गर्व कर सके और खुद को ऐसी विरासत का उत्तराधिकारी मान स्वयं गर्व मेहसूस कर सके । है प्रभु सद बुद्धि देना । जय स्वराज । 


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