राहत के इन्तजार में तबाही का आंकलन शुरू
हाइबे से लेकर कई पुल पुलियो के परखच्चे उड़े
मंत्रियो की रायसुमारी के बीच आफत से दो चार होते लोग
वीरेन्द्र शर्मा
6 अगस्त 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
भीषड़ बारिस के बीच ग्वालियर चंबल के कई जिले मे आये बारिस के सैलाब ने जहाॅ विकास का भुर्ता बना उन्है जमीदोस कर मिटटी मे मिला दिया तो वही बर्षो पूर्व निर्मित कई पुल पुलिया भवन आज अपनी प्रमाणिकता सिद्ध कर अपने अस्तित्व और उस कुशल कोशल पर गर्व कर रहै है ये अलग बात है कि बारिस के रूप मे आई तबाही की आफत के बीच राहत के लिये आकलन के दौर शुरू हो चुके है लोगो को राहत बटेगी भी और शायद मिलेगी भी मगर लूटे ये दौर खत्म होगा इसकी गारंटी नही जिस तरह से जनता के करोड़ोे खर्च कर बने पुल , सड़क हाईबे की गांरटी है कि वह जहां भी गांरटी मे होगे ठेकेदार बनायेगा और जहां गारंटी नही वहां जनता का धन फिर लगाया जायेगा जिससे आमजन के मार्ग सुगम सहज हो सके अब इस मे कितना समय लगेगा यह गांरटी तो कोई नही दे सकता बस राहत बतौर मुक्त कंठ से आश्वासन अवश्य मिल सकता है जो लोगो को इतनी बड़ी तबाही के बीच बड़ी राहत कहा जा सकता है । प्राक्रतिक आपदा की भेट चढ़ा विकास भले ही अब सिसके या छाती पीटे मगर राहत तो मुहैया आने के बाद ही बटेगी बैसै भी कोरोना महान ने विगत दो बर्ष से शासकीय खजाना खाली कर रखा है अब उस यह बारिस की मार और क्या क्या दिन दिखायेगी यह कहना जल्द बाजी होगी मगर सर्ब तो रखना ही पड़ेगा हालाकि दिलाशा देने मंत्री निकल पढ़े है जिससे बिलखते लोगो को संबल मिल सके और व्यवस्थाये चाक चैबंद बनी रहै जो तबाही इस बारिस मे श्योपुर शिवपुरी ने देखी है शायद सौबर्षो मे शायद अन्यत्र कही हुई हो श्योपुर मे कलेक्टर एस पी पर फूटा गुस्सा इस बात का परिणाम है कि जनता अनियंत्रित विकास की तवाही से खुश नही इसमे अबिलम्ब सुधार होना चाहिए और विकास के इस तरह के फाॅरमूलो को बदलना चाहिए जिसमे जबाब देह का अता पता न हो न ही कर्ताओ पर डिटेल हो न ही उन पर क्षैत्रीय प्राकृतिक डी. पी. आर हो साथ ही पैबन्द लगाने की प्रवृति से मुक्ति पा लोगो को जबाबदेह बनाना होगा तभी जाकर इस तरह के हादसे बिभीषिकाओ को रोका जा सकता है प्राकृतिक ज्ञान विज्ञान के कोई भी ज्ञान जीवन का सही सारथी सिद्ध नही हो सकता यह बात सत्ताओ शासन को ठीक से समझ लेनी चाहिए क्योकि श्योपुर मे घटित घटना आम नही वहा संवैधानिक पदो पर आसीन लोगो पर हमले का आक्रोश बस प्रयास हुआ है जो सोचनीय होना चाहिए यह जनता जनार्दन है यह वोट दे सकती है तो आक्रोश भी अपने ही अन्दाज मे व्यक्त कर सकती है इसलिये पारदर्शिता बनी रहै और जबाबदेही के साथ संबैधानिक पदो को खुले मन से काम करने का मौका भी मिलता रहै । बाकी परिणाम तो हमारे सामने है ही ।

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