बिखरते ,सपने विश्वास खोती साख संकट मे जन , जीवन
केन्द्र से सीख ले राज्यो की सरकार
विधि का उपहास उड़ाते समाधान , दर्द बना नासूर
वीरेन्द्र शर्मा
21 अगस्त 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
सेवा कल्याण को लेकर जन जीवन के बीच जो विश्वास का संकट खड़ा हो रहा है निश्चित ही उसके चलते आम सपने बिखरना तय है क्योकि जन जीवन के बीच जिस तरह से सेवा कल्याण की साख टूटी है उसने जन जीवन को हताश ही नही निराश भी किया है मगर साख है जो शर्म लेने का नाम ही नही लेती कारण साफ है जिस तरह से जबाबदेही के अभाव मे विधि का माखौल उड़ाने का दौर सर छिपाने सेवा कल्याण मे शुरू हुआ है अब वह किसी से छिपा नही रहा जो सत्य भी है और साख डूबने का प्रमाण भी मगर दुर्भाग्य की अभी भी ऐसे ऐसे कारण गिनाये जाते है जिन्ह देख सुन शर्म भी चुल्लू भर पानी में डूब मरे मगर जीते जागते कुछ जीवन जबाबदेह लोग आज भी इस सच्चाई से अनिभिज्ञ ही रहना चाहते है । अब इसके पीछे की बैबसी मजबूरी क्या है यह तो वही जाने मगर इस रेलम पैल मे उस निरपराध जीवन का डूबना तय है जिसने विधि मे अपनी गहरी आस्था व्यक्त कर अंगीकार किया कोई संगीन अपराध नही यह बात हर उस जबाबदेह के संज्ञान मे होना चाहिए जिसे विधि संबत विधि का संरक्षण और उत्तम जीवोत्पार्जन के साधन । अगर हम यो कहै कि जो मिशाल केन्द्र ने विगत बर्षो मे जबाबदेही की प्रस्तुत की है वह मिशाल है अगर सियासी अरोप प्रत्यारोपो को दरकिनार कर दे तो जो भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का उदाहरण देश मे प्रस्तुत किया वह सभी राज्य सरकारो को अनुकरणीय होना चाहिए जो शायद नही हो पा रहा है । परिणाम कि भवन निर्माण के पूर्व तो सड़के जारी बारिस मे उधड़ी नजर आती है मगर इस बार की बारिस मे ग्वालियर चबंल मे सीरियल किलर की भाती कई बृहत पुलो का नाम निशान मिट जाना समझ से परे है उस पर से शासन के विशेषज्ञो द्वारा र्निधारित दर से 20 से लेकर 30 फीसद दर पर निर्माणो की स्वीकृति गवाह हैे कि जबाबदेह कितने सजग और कारगार है 21वी सदी मे 3- 3 दिन बिजली का जरा सी बारिस मे ब्लेक आउट हो जाना शर्म की बात है जब इसी म.प्र. मे विगत कुछ बर्षो मे बिजली सुधार पर लगभग 2200 करोड़ खर्च हुये है और हाॅल ही मे लगभग 14 हजार करोड़ की राशि सरकार ने बिजली कंपनियो को घाटा पाटने दी है फिर भी गाॅब गलियो नगरो महानगरो मे आतिषबाजी करती बिजली लाइनो के केबिले धमाके के साथ दम तोड़ती डी. पी. किसी खेत की फसल की तरह बिजली पोलो का बिछ जाना निश्चित जन जीवन के बीच बढ़े संकट की घंटी है क्योकि भवनो मे अस्पताल से लेकर विद्यालय , आॅगनबाड़ी , शासकीय भवन तो सड़क पुलो से यात्री वाहन गुजरते है अगर वाक्य मे कम कीमत का नासूर इन निर्माणो मे है तो निश्चित ही जन जीवन को तैयार रहना चाहिए कि भबिष्य कैसा रहने बाला है और जबाबदेह लोग भबिष्य मे अपनी कृतज्ञता के कैसै कैसै उदाहरण प्रस्तुत करने बाले है मगर फिलहाॅल तो ईश्वर से ही प्रार्थना मुनासिब कि वह जल्द ही जबाबदेहो को सदबुद्धि तो सरकारो को साहस दे कि वह जन जीवन की सेवा कल्याण पूर्ण मनोवल से कर पाये ।

Comments
Post a Comment