सियासी संघर्ष में सफर करते जीवन सरोकार
स्व ऐजन्डो के रथ पर सबार महात्वकांक्षाये संग्राम को तैयार
समृद्ध खुशहाॅल सर्बकल्याण का सपना हुआ तार तार
व्ही. एस. भुल्ले
1 सितंबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
सरोकारो की नुमाईस लगा जन भावनाओ को लूट महात्वकांक्षा
पूर्ति पर जश्न मनाने बालो को क्या पता कि सत्ता सियासत से इतर भी सार्बजनिक जीवन के कुछ सरोकार ऐसे होते है जिन पर समुची सृष्टि का आधार टिका है जन जीवन के कल्याण का भाव छिपा है । मगर स्व ऐजेन्डो के रथ पर सबार आज की महात्कांक्षाये मानो भीषण संग्राम छेड़ सर्बकल्याण के ऐसे ऐसे आधार तैयार करना चाहिती है जिससे कल्याण तो दूर की कोड़ी ऐसे में सिर्फ सपने ही शेष बच इसमे भी संदेह होना स्वभाविक है । जिसमें जीवन सरोकार की तो मानो बाठ लगना ही तय है कारण साफ है हर एक का अपना ऐजन्डा है हर एक की अपनी महात्वकांक्षा फिर वह इकिल्ला हो या समूह में मगर उन निरीह जन जीवन का क्या जो कल्याण की आश लगाये बर्षो से सिर्फ उस सपने को सजोय बैठा है जो अब इस संघर्ष के दौर में मुश्किल ही नही न मुमकिन सा लगता है आज सियासत के आगे पुरूषार्थ कल्याण जिस तरह से हाफनी भर रहा है वह शायद ही किसी से छिपा हो हर एक को चिंता अपनी अपनो की है । सर्बकल्याण मानो इस भूभाग से अनाथ हो गया हो परिणाम की हर एक सत्य से खुला संघर्ष कर लेना चाहता है फिर जन जीवन का जनाजा उठे या फिर मईयत निकले इसकी परवाह किसे बात सिर्फ यही तक रहती तो भी सिर्फ्र मातम से काम चल जाता मगर समृद्ध खुशहाॅल जन जीवन का जो कचूमर सत्ताओ की खातिर बनता रहा है लगता उससे अछूती न तो पहले सियासत रही है न ही भबिष्य मे भी रहने बाली है अगर जीवन सरोकार का मूल सिद्धान्त यही है तो फिर शिकायत कैसी मगर फिर मानव धर्म के मायने क्या हो सकते है शायद इसकी भी कोई नई इबारत लिख जाये तो इसमें किसी को कोई अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए । मगर लाख टके का फिर वही सबाल है कि जंगली जीवन और मानव जीवन सरोकारो मे फर्क क्या ? राजा का परिषद का धर्म होता है कि जीवन संकट के दौरान कम से कम जन हानि पर समाधान न्याय मिलना चाहिए । जो जंगल का नैसर्गिक प्रकृति प्रदत कानून है चूकि मानव ही वह जीवन है जो समस्त जीवनो सक्षम श्रेष्ठ माना गया है अगर मानव स्वयं उसकी ही जमात को न्याय और सत्य की स्थापना में अक्षम असफल सिद्ध होने लगे तो फिर किससे जीवन को उम्मीद करनी चाहिए जो आज एक बड़ा सबाल है । आज के ज्ञान विज्ञान की चकाचैध मे भौतिक सुख सुबिधाओ के पीछे भागता इन्सान कहा रूकेगा यह तो भबिष्य की बात है मगर आज वह जिस समृद्धि खुशहाॅली के लिये इन्सान जीवन सरोकारो को तिलांजली दे जीवन संग्राम को तैयार है उससे उसे क्या हासिल होगा यह तो भबिष्य तय करेगा मगर जो बैहाल बैबसी मानव जीवन का भाग बन रही है उसे अवश्य आज भी न्याय कल्याण की तलाश विचार अब हमे करना है हम कैसै जीवन और कैसी विरासत आने बाली पीढ़ी को छोड़ना चाहते है । क्योकि अगर समृद्ध खुशहाॅल जीवन , प्रतिभा , सामर्थ , पुरूषार्थ के साथ न्याय नही हुआ उसमे कोताही हुई तो यह आज के मानव जीवन , सत्ता , सियासतो की बड़ी भूल होगी जो महात्वकांक्षाओ के बूटो तले बड़ी ही बैरहमी से रौधी जा रही है थोड़ा कहा बहुत समझना न हो तो इस ज्ञान को किसी भी विज्ञान के पैमाने मे तौल लेना जिस तरह से बाढ़ के वेग , तूफान की दिशा और आपदा को नही रोका जा सकता उसी तरह प्रतिभा बौद्धिक संपदा को बगैर दिशा दिये रोका जा सकता है । जय स्वराज ।

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