संबिधान उन्मुख सरकारो में विधान उन्मुख सरकारो की उपेक्षा

 

गाॅब गली में पनपता सत्ताओ के प्रति आक्रोश 

छल से छल्ली होता ग्राम स्वराज 

धर्मेन्द्र सिंह गुर्जर 

28 सितंबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


छल न तो किसी सत्ता का अपने ही जनो के बीच न तो कभी पुरूषार्थ रहा है न ही न ही सफल सामथ्र्य का इतिहास मगर आज जिस तरह से व्यवस्था के नाम संबिधैानिक सरकारो का व्यवहार विधान उन्मुख गाॅब गली की सत्ताओ के प्रति प्रतीत हो रहा है उससे भले ही सेवा कल्याण की बांछे खिली हो मगर जो आक्रोश आज गाॅब गली मे सत्ताओ के प्रति पनप रहा है वह बढ़ा घातक है उन स्वार्थ वत सत्ताओ या सत्तासीनो के लिये , जो सर्बकल्याण से इतर स्वकल्याण को ही अपना परम धर्म कर्म मान चुके है और वह किसी भी कीमत पर सत्ता से विमुख नही होना चाहते । फिर गाॅब गली के बीच मौजूद ग्राम गली स्वराज का सपना छल्ली छल्ली हो बीच चैराहे पर ही दम क्यो न तोड़ दे मगर जब लोकतांत्रिक व्यवस्था मे जब सत्ताओ के प्रति मे उनकी पहचान के विश्वास का संकट उत्पन्न होता है तो स्वभाविक ऐसी परिस्थितियां पैदा होती है मगर कहते है अहंकार मे डूबी सत्ताओ को न तो इनका छौव होता है न ही अफसोस जैसा की पंचायती राज का कार्यकाल खत्म होने के बाद जो स्थति सामने आ रही है ये सही है कि सत्ताओ ने कार्यकाल पश्चात चुनाव न होने तक मौजूद जनप्रतिनिधियो को समितियो के माध्ययम से जबाबदेही से मुक्त नही किया है मगर उनका मानदेय को छोड़ गाड़ी भत्ता रोक दिया है । जो लगभग डेढ़ बर्ष मे बढ़कर लाखो के पार पहुॅच गया है अगर स्वयं का कार्यकाल पूरा कर चुके जनपद अध्यक्ष जिला अध्यक्ष की माने तो उसका भुगतान आज तक नही हो सका है जिसे लेकर कुछ लोग जहां न्यायालय की शरण मे जाने की तैयारी मे तो कुछ लोगो का कहना है कि बैसै भी सत्ताओ ने विगत पांच बर्षो तक विधान अनुरूप समय समय पर जारी निर्देशो की आढ़ मे कार्य ही नही करने दिया लास्ट समय मे भी हमारे साथ साथ विश्वासघात हुआ है । ये अलग बात है कि स्वराज के मुख्य संयोजक श्री व्ही. एस. भुल्ले जी से जब पूछा गया तो उनका स्पस्ट मत था कि खेती किसानी के प्रदेश मे गाॅब गली की सरकारो की उपेक्षा ठीक नही न ही यह लोकतांत्रिक भावना के अनुरूप अब इस पर विचार सत्ताओ और सियासी दलो को अवश्य करना चाहिए 

क्योकि किसी भी बृहत लोकतंत्र की आत्मा गाॅब गली मे ही बस्ती है अगर गाॅब गली से सत्ता का विधान उन्मुख भाव नोच लिया जायेगा तो लोकतंत्र स्वतः ही बैजान हो जायेगा यह बात न तो सत्ता को भूलना चाहिए न ही सत्तासीनो को क्योकि लोक और सत्ता की महत्वता तब तक ही रह सकती है जब तक दोनो का मान सम्मान लोक के बीच रहेगा और तभी ग्राम स्वराज की परिकल्पना पूर्ण होगी जब सत्ता का भाव गाॅब गली मे सुरक्षित रहेगा । इस बृहत समस्या पर संवाद भी होना चाहिए और पत्राचार के माध्ययम से सत्ताओ सत्तासीनो को अवगत भी कराना चाहिए हमारी कोसिश होगी और होना चाहिए कि यह भाव सिर्फ अक्षुण ही नही लोकतंत्र मे सुरक्षित भी रहै । 

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