भयमुक्त न्याय मे गिड़गिड़ाता जीवन ..............? तीरंदाज


हताश निराश जीवन को नैसर्गिक समृद्ध जीवन की दरकार 

व्ही. एस. भुल्ले 


28 सितंबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

भैया - जीवन फन्दे पर झूल रहा है , कभी कभी ट्र्ेनो के सामने कूद रहा है तो कही कही हताश निराश हो जीवन लीला समाप्त कर रहा है मगर उस जीवन को न तो नैसर्गिक न्याय न ही सामाजिक न्याय मिल पा रहा है । गिड़गिड़ाता जीवन आज भी समृद्धि खुशहाॅली की तलाश मे तिलतिल मर रहा है आखिर यह हो क्या रहा है । आखिर सेवा कल्याण और भय मुक्त न्याय क्या कर रहा है ? 

भैयै - मुये चुप कर क्या थारे को म्हारा 21बी सदी का भारत समृद्ध होते नही दिख रहा है अंतरिक्ष मे झड़े गड़ रहै मिशाइलो की गूॅज से दुश्मनो के दिल धड़क रहै गाॅब गरीब को सस्ता राशन स्वास्थ बीमा पेयजल के पैकेज मिल रहै है फिर भी थारे कलैजे को ठंडक नही जो तने अर्र बर्र बोल रिया शै । 

भैया - प्रभु का काम चल रहा है सेवाओ का सैलाव तो कल्याण का पहाड़ फूट रहा है मने जाड़ू मगर म्हारे मगज मे एक बात न आबे कि तो फिर जीवन संघर्षो से हार अपना असतित्व क्यो खो रहा है । पहले तो कभी कभार ही जहाजो का हल्ला नगर शहर गाॅबो मे सुनाई पढ़ता था अब पूरा का पूरा बैड़ा आय दिन सेवा कल्याण को लेकर घूम रहा है । 

भैयै - थारे जैसै ताली ठोकाओ यही तो खराबी है । कुछ कभी अग्रेजो की जीत पर तालिया बजाया करते थे तो कुछ आज भावनाओ मे वह ताली ठोके जा रहै फिर आखिर ताली तो होती ही बजाने के लिये है । सो जब बज जाये इसमे ऐसा क्या है जो तने सर सियासत उठाये घूम रहा है । 

भैया - मने जाड़ू थारा इसारा मने तो सिर्फ उतना ही बोल खोल रहा हुॅ जो पर्चे पर लिखा है या कहा है वही तौल रहा हुॅ यह तो तने मने दोनो ही जाड़ू की ज्ञान को भूल शिक्षा के सागर मे डूबने बालो का क्या दोष जिनमे आज भी सागर की   भाॅती सभी को आत्मसात करने की अचूक शक्ति सो मने तो सिर्फ इतना ही कहना चाहुॅ कि भाया कुछ तो करो वरना कही आने बाली पीढ़ी हम पर गर्व करने के बजाये कही शर्म मेहसूस न करे यही म्हारा दर्द है और यही म्हारी पीढ़ा । जय स्वराज ।  


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