लुटेरो मे भी स्वामी बन सेवा करने की गजब चाहत रही है


सत्ता स्वभाव को लेकर उठते सबाल , बहस होती बैमिशाल 

सर्बकल्याण जीवन का मूल धर्म सेवा कल्याण आधार 

व्ही. एस. भुल्ले 

7 सितंबर 2021 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 


सर्बकल्याण के मूल धर्म से बिमुख जीवन का मूल आधार भले ही नैसर्गिक रूप से सेवा कल्याण ही रहा हो मगर सेकड़ो बर्षो से जो संस्कृति इस मानव जीवन के लिये अभिषाप बनी शायद उसमे विराम आज भी ओझल नजर आता है विभिन्न आक्रांताओ से लेकर सत्ताओ के विभिन्न रूप मे घर चुकी स्वामी बन सेवा करने चाहत क्या लुटेरे संस्कारो की गुलाम हो सकती है यह चर्चा आज कल आम जीवन मे तेज है । अगर मशखरो की माने तो आक्रांता तो इस महान भूभाग से बर्षो पहले चले गये या उनके नामो निशान तक मिट गये हो मगर जो अनाथपन आज गांब गली मोहल्लो या चंबल घाटी या शहर महानगरो छाया है अब वह अबूझ पहली उन लोगो के लिये बनता जा रहा है जिनकी दिलचस्बी दस्यु सरगना डकैत डाॅन भाई दादा गुन्डो के इतिहास खगालने मे रहती थी मगर दो दशक बीतने को है मगर कोई ऐसा नाम ढूढे नही नजर आता जिस पर कोई फिल्म या कहानी लिख ली जाये या फिर कोई डाकूमैन्टरी तैयार की जाये शायद यही दर्द सियासत मे थोड़ी बहुत सोच समझ रखने बालो के बीच छलकता है बहरहाॅल सच क्या है यह मूड़धन्य विद्यवान या सियासत दान ही जाने मगर जो अकाल समाज मे इन महान कैडागिरी को लेकर है वह बड़ा ही यक्ष है यू तो हजारो बर्षो से लुटेरो इस समृद्ध भूभाग पर करते रहै तो कुछ पहले सेवक फिर लोगो के स्वामी तो कुछ खुद ही शासन सत्ता बन गये मगर सौभाग्य की हम आज आजाद है स्वतंत्र है सेवक भी हम है और स्वामी भी हम अगर कुछ हमारे बीच नही तो वह हमारे ही बीच रह जीवन को आतंकित कर उसे दहसत मे पल पल रहने को मजबूर करने बाले वह दस्यु डकैत डाॅन माफिया जिनके कहर से कभी जीवन ठहर सिहर जाता था कहते है जब प्रकृति सारे गुण अवगुण हो सकते तो फिर मानव समाज कैसै बिकलांग रह सकता है मगर सच है अब जापते मे हमारे बीच से यह बुराई जा चुकी है मगर अब यह कहा है यह विचारणीय प्रश्न हर उस समझदार जीवन के सामने होना चाहिए जो आज दरिद्रनारायण सा जीवन जी स्वयं को धन्य समझते है सबाल उन लोगो के सामने भी होना चाहिए जो सेवा कल्याण को मानव जीवन का मूल आधार मानते है । भले ही यह बहस बैमिशाल हो मगर परिणाम सार्थक न हो तो उसका कोई अर्थ नही रह जाता सो आज तो सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कौन लुटेरा कौन स्वामी कैसी चाहत सब जीवन के वही भाग है जिन्है समझने हर जीवन को उत्सुक रहना चाहिए क्योकि किसी भी बुराई का अक्स बदल सकता है मगर उसका आचरण नही फिर वह सेवा हो सियासत या फिर सत्ता बहुत कुछ आचरण संस्कृति पर निर्भर करता है बैसै भी कहा गया है 300इसबी पूर्व की राजकोष को सबसे बड़ा खतरा राजपुरूषो से होता है न की किसी ओर से सो सर्बकल्याण ऐसे तथ्यो की अनदेखी जीवन मे उस जल के समान है जो दूषित होने पर जीवन का संकट और शुद्ध होने पर जीवन के लिये अमृत सिद्ध होता है । जय स्वराज । 


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