मूल आधार से संघर्ष करती महात्वकांक्षाये व स्व विचार
कुतर्क की बैदी पर स्वः होती संस्कृति और संस्कार
सत्ताओ की कर्तव्य विमुखता मे बैबसी हुई तार तार
व्ही. एस. भुल्ले
8 सितंबर 2021 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
यू तो समृद्ध खुशहाॅल जीवन का संरक्षण संर्बधन सत्ता शूरवीरो का धर्म और कर्म रहा है । मगर जब जब सत्ताये कर्तव्य विमुख हुई उसका दुसपरिणाम हमेशा ही बैबस जीवन को भोगना पढ़ा है तार तार बैबसी के बीच अगर हम यो कहै कि जीवन ने मानव धर्म के अभाव मे बड़ी बड़ी त्रासदी देखी है मगर कुतर्क की बैदी पर स्वः संस्कृति संस्कार इस तरह से अपने समृद्ध अस्तित्व के लिये संघर्षरत होगे किसी ने शायद ही सपने मे सोचा होगा आज जीवन के मूल आधार से खुला संघर्ष करती महात्वकांक्षाये विनासक स्व विचार इस मानव समाज को आने बाले समय मे क्या पहचान और आने बाली पीढ़ी को क्या को विरासत मे क्या छोड़ेगे यह कहना तो जल्द बाजी होगी मगर जो परिदृश्य उभर रहा है वह बड़ा ही वीभत्स जान पड़ता है जो न तो मानव समाज के हित मे है न ही पृथ्वी पर मौजूद जीवजगत के हित मे मगर विधान व्यवहार मे समाज मे सब चल रहा है कुर्तको के सहारे नये नये मनगड़त स्व शोध तर्क की मानो बाढ़ सी आ गयी है मगर मूल जीवन आधार की चर्चा आज विधवाओ की भांती समृद्ध जीवन की तलाश मे है प्रमाणो के अभाव मे कुतर्को से भरे बाजार खूब सच रहै सर्बकल्याण से इतर स्व कल्याण के नारे आजकल सरबुलन्द हो रहै मगर बैबसी आखिर करे भी तो क्या ? यह यक्ष सबाल हर समझदार जीवन के लिये यक्ष होना चाहिए जिसकी आस्था स्वयं के साथ सर्बकल्याण की है बर्तमान हालात इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते है कि जो गलतिया हजारो बर्ष पूर्व हुई वही गलतिया एक मर्तवा फिर से दोहराये जाने आतुर है पहले भी छोटे छोटे हित और अपने अपने की संस्कृति ने हमे कभी सरसब्ज नही होने दिया और जीवन सर्बकल्याण के इतर एक ऐसे अन्तहीन संषर्ष मे उलझ गया जिसका निदान आज तक संभव नही हो सका मगर इतिहास से सीख लेने के बजाये स्वयं इतिहास बनने को आतुर स्व कल्याण बर्तमान की नीव पर बर्तमान मे ही भबिष्य के भव्य महल भवन कीर्ति स्थापित करना चाहता है जो एक बड़ी भूल ही साबित होगी धड़े टुकड़ो मे बटती सियासत और सत्ताओ के लिये सौदेबाजी जैसी चर्चाओ पर भले ही जीवन्त मानव समाज का संज्ञान न हो मगर आने बाले समय मे होने बाले सच के दीदार इतने दर्द भरे हो सकते है जिसका भान न तो कुतर्कियो को है जो स्वयं को स्वविद्धवान घोषित कर ज्ञान बाटते घूम रहै है मानव जीवन के किसी भी कृतय से मानव जीवन की सहमति असहमति हो सकती है मगर जीवन का मूल आधार तो सर्बकल्याण ही है क्योकि सृष्टि मे जो भी सृजन मे मौजूद है वह सब जीवन के आधार ही है और सन्तुलन उसकी आत्मा जरा से सूत्र को भूल जो जीवन आज जीवनो की बैबसी का लाभ उठा मिथक जीवन दर्शन थोपना चाहते है या थोपते रहै है सिर्फ और सिर्फ सर्बकल्याण से इतर स्वकल्याण की खातिर ऐसे लोगो ने प्रकृति , सृष्टि से तो दुराग्रह किया ही है बल्कि मानव जीवन को भी लज्जित किया है बैहतर हो समय रहते हम सच को समझ पाये तो यह जीवन मानव जीवन के रूप मे मानव की बड़ी सफलता होगी वरना हमे एक ऐसे भबिष्य और बर्तमान के लिये तैयार रहना चाहिए जिसकी इच्छा शायद कोई जीवन रखता हो । जय स्वराज ।

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