पुण्यभूमि पर जघन्य अपराध , दर व दर भटकती जीवनदायनी


करोड़ो फूकने के बाबजूद नही मिला जीवन को आसरा 

जीवन की तलाश मे मौत को गले लगाता गौवंश 

व्ही. एस. भुल्ले 

29 सितंबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 


काश विधान को त्यागते और संबिधान को स्वीकारते वक्स गौवंश को भी मत का अधिकार प्राप्त होता तो शायद ही यह दुर्गति इस महान गौवंश की होती न ही उन्है जीवन की तलाश मे मौत नसीब न होती मगर हमारे लोकतंत्र मे इस तरह की घटनाये आम हो चली है सड़को पर वाहनो की चपेट मे आने से गौवंश की श्रंखलाबद्ध मौतो का नजारा भी आम न होता न ही उन्हे चारे पानी की तलाश मे दरदर भटकना पड़ता धन्य है वह राजवंश जिनके राज मे गौवंश की अपनी मिलकियत हुआ करती थी और आम मानव की भांती उसे भी कर्म के साथ स्वाभिमानी जीवन जीने का अधिकार था उसके अपने निस्तारी तालाब पोखर झरने बाबड़ी कुये और हर गाॅब मे चरनोई भूमि और जंगलात मे स्वछंद चरने के अधिकार थे । जिसे संबिधान निर्माताओ ने भी यथावत रखा मगर दुर्भाग्य उनका यह अधिकार उनके हाथो से कब छीन लिया गया कोई बताने तैयार नही हद तो तब है जब आज भी गाय का दूध घी सर्बोपरी और गाय के गौवर से गौधन , गणेश प्रतिमा बनाई व पूजी जाती है और चैखटे पर लीपना आज भी गोवर का ही उत्तम माना जाता है लोखो करोड़ो लोग ऐसे भी है जिन्है वृन्दावन या गोवरर्धन पुण्य कमाने जाना या भागवत करा पुण्य कमाना होता है मगर जिन प्रभु ने गौधूली को माथे से लगाया जिन्है स्वयं चराया उनकी सेवा की उन्ही के भूभाग पर ऐसी र्दुदशा ईश्वर ही जाने कि उन्है किस श्राफ की सजा मिल रही है कि आज की मानवता विचार करना तो दूर उनकी बैबसी पर तरस भी नही खा रही न ही उनका छीना हुआ हक उन्है बापस दिला पा रही जो किसी भी मानव सभ्यता के लिये दर्दनाक ही शर्मनाक भी होना चाहिए मगर लगता नही शिक्षित लोग इसे समझ पाये शायद हमारे पूर्वजो ज्ञान विद्या को त्याग शिक्षा का ककहरा गढ़ते वक्त सोचा होता तो यह दुरदिन न तो गौवंश को देखना पड़ते न ही लम्बी चैड़ी कदकाठी बाली नस्ल को बौने नस्ल का उत्तराधिकारी बन बूसटर डोज की तलाश मे निकलना पढ़ता अब विचार उन सज्जन श्रेष्ठजनो को करना है जो आज भी शिक्षा का तमगा गले मे डाल ज्ञान के तिरस्कार मे जुटे है और समृद्ध खुशहाॅल जीवन को शिक्षा की अंधेरी गलियो मे तलाश रहै है जो न तो तब सिद्ध सार्थक हो सकी न ही अब और न ही भबिष्य मे सिद्ध होने बाली है । जय स्वराज । 

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