साख के संकट से जूझती सेवा , कंगाल हुआ कल्याण
लज्जित होती मानव सभ्यता दर्शक बना पुरूषार्थ
फोटो शेसन आश्वासन , आफत मे राहत से थर्राई मानवता
व्ही. एस. भुल्ले
9 सितंबर 2021 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
यू तो सेवा का संकट संघर्ष कोई नई बात नही मगर सेवा के नाम सेवा की साख पर जिस तरह से बटटा सरेराह लग रहा है और कल्याण चीख चीख कर अपनी कंगाली का हाॅल ये बयान कर रहा है वह लज्जित होती मानव सभ्यता पर सबाल खड़े करने काॅफी है पुरूषार्थ के दर्शक बने रहने से यह बात तो बिल्कुल साफ है कि फोटो शेसन आश्वासन , आफत मे राहत से थर्राती मानवता आज भले ही चुप हो मगर यह चुप्पी और कब तक रहेगी यह मानव समाज को सोचने बाली बात होना चाहिए । जिस तरह से मानव समाज के बीच आजकी इन्सानियत के कत्ल का दौर शुरू हुआ है ऐसा नही कि मानव समाज उससे बाकिफ न हो मगर सीमाओ दायरे मे बटा मानव समाज फिलहाॅल कुछ भी करने की स्थति मे नजर नही आता कारण जो भी हो मगर इतना तो तय है कि जिस तरह से सेवा साख पर स्थापित संस्था संगठनो को शुसोभित करने बालो के कारनामे आये दिन सुर्खिया बन मानव जीवन मे सुख्र्र लाल हो रहै समाज के अन्दर ही समाजद्रोही फल फूल रहै है वह भी सेवा के नाम उससे कुछ हुआ हो या नही मगर कल्याण बैभाव ही कंगाली के दलदल मे फसता जा रहा है जो आज सबसे बड़ा चिन्ता का बिषय हर एक इन्सान को होना चाहिए । पगु पुरूषार्थ के बीच लज्जित मानव सभ्यता के पास कहने फिलहाॅल कुछ भी न हो मगर यह जन जीवन के हित मे कतई नही कहा जा सकता । जिस तरह से फोटो शेसन और आफत मे राहत के नुख्से सियासत को क्या नसीब मानो जन जन धन्य हो लिया हो शासद इसी का नाम सियासत है मगर ऐसी सियासत कभी सामथ्र्य वान समृद्ध सत्ता की सारथी भी हो सकती है यह यक्ष सबाल हर समझ रखने बाले के मन मस्तिक्स मे हो सकता है मगर अनुभूति विहीन ऐसी सेवा कल्याण और कब तक जन जीवन के धैर्य को अपनी कसौटी पर तोलेगी यह तो वह सियासत दान ही जाने मगर बड़ी उम्मीद आज भी ऐसे सामर्थ पुरूषार्थ से मानव सभ्यता को आज भी है जिनकी आस्था आज भी सच्ची सेवा और अनुभूति पूर्ण कल्याण से है ईश्वर सदबुद्धि दे ऐसे मानव मौजूद महामानवो को जो स्वयं को इस योग्य समझते है और ईश्वर ने उन्है यह सामर्थ इस जीवन मे दिया है । जय स्वराज ।

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