खण्ड खण्ड महात्वकांक्षा मे लुटता राजकोष
मूल्य सिद्धान्त से विमुख जीवन हुआ लाचार
सत्ता संघर्ष मे बिलबिलाता जीवन , सर्बकल्याण हुआ अनाथ
व्ही. एस. भुल्ले
1 अक्टुबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
लोकतंत्र के नाम राजतंत्र , सम्राज्यबादी सोच पर आज चर्चा भले ही निर्थक हो चुकी हो मगर डन्डे के जोर पर सेवा कल्याण आज का सियासी दस्तूर बनता जा रहा है । लोकतंत्र मे वोट और घसिटते जीवन की बैबसी ऐसी भी हो सकती है कि लुटते राजकोष पर लगभग सभी की सहमति फिर वह राजी हो या गैर राजी यह एक अलग विषय है मगर खण्ड खण्ड महात्वकांक्षाओ के बीच आज सियासी तौर पर सेवा कल्याण के नाम जो हो जाये वह कम है । मगर धन्य है वह लोग जो चन्द रूपये की खातिर स्वयं को कलंकित कर आने बाली पीढ़ियो को भी कलंकित करने पर उतारू हो जाते है मगर कहते है समय को किसने देखा है एक समय वह भी था जब राजसत्ता के खिलाफ आवाज उठाने पर सर कलम कर दिये जाते थे और जनता से बसूले गये वैरहमी पूर्ण कर राजकोष कहलाते थे मगर उस समय भी राजकोष मे सेंध लगाने या लगबाने बालो को राजद्रोही मान उचित दण्ड दिया जाता था उसको खर्च करने की एक व्यवस्था थी मगर आजकल लोकतंत्रो मे जिस तरह से राजकोष का उपयोग सेवा कल्याण के नाम होता है वह सत्ता व्यवस्था का सेवा कल्याण विकास का भाग माना जाता हे जिसके लिये अलग से लेखा विभाग है जो सत्ताओ द्वारा निर्धारित नीतियो के अनुरूप नियम कायदो के मददेनजर खर्च को जाचने का अधिकार रखता है और अपनी रिपोर्ट सदन मे रखता है मगर जब अब खजाना ही खाली हो उधार के माल पर भण्डारे चल रहै हो तो खण्ड खण्ड महात्वकांओ के बीच पूछे कौन ? और आज तो खण्ड खण्ड होते समाजो को पूछने की फुरसत कहा जो वह सत्ताओ से दबाब दे पूछ पाये की आप बर्षो सत्ता सुख दोहते रहै फिर लोग वैहाल क्यो ? लाखो की संख्या मे बेरोजगार क्यो असुरक्षित होते समाज मे आय दिन बलात्कार मर्डर लूटपाट माफिया राज क्यो शायद यह सबाल न हो इसलिये आयदिन नये नये सामाजिक रगड़े झगड़े सामने आते रहते है जिससे समाज तो कमजोर हो रहे है राज ओर राष्ट्र् भी कमजोर हो रहै है । परिणाण की मां अपने कलेजे के टुकड़े , अपने बच्चो के साथ आत्म हत्या तो नौजबान रेलो के आगे कूद रहै है अगर समाजिक तौर भला हो रहा होता तो लगभग कई समाजो को सत्ता मे बैठने का मौका मिला बल्कि कुछ सियासी दल और दलो मे मौजूद नेताओ का आधार ही समाज बिशेष है आखिर ऐसे कितने समाज समृद्ध खुशहाॅल हो लिये यह आज समाजो को समझने बाली बात होना चाहिए आखिर क्यो हम जीवन मूल्यो सिद्धांतो को बिसार एक ऐसे समाज के निर्माण मे जुटे है जिससे न तो मानव जीवन , समुचा जीव जगत समृद्ध होने बाला है न ही कभी स्वराज का सपना साकार होने बाला है विचार सभी को करना हे और यह विचार तब की स्थति मे और विचारणीय हो जाता है जब सत्ताये स्वयं को दाता और जनता जनार्दन को दया का पात्र घोषित करने पर उतारू हो हमे यह नही भूलना चाहिए यह धन वह धन होता हे जो राजकोष बन सत्ताओ के खजाने तक जाता है ओर सेवा कल्याण के नाम सियासी तौर पर सतत सत्ता मे बने रहने उतना ही बाटा जाता है जिससे राहत का क्रम और आफतो का दौर समाज मे बदस्तूर बना रहै और वोट बटोरने का खेल सत्ता की खातिर ऐसे ही चलता रहै बैहतर हो युवा बुजुर्ग राज नही तो खुद की माली हालत और मानव धर्म पर विचार करे उन जीवन मूल्यो की रक्षा तो आने बाली को कलंकित न करे वरना लुटते राजकोष से किसी का भला करने बाला नही । न हजारो बर्ष पहले हुआ और न ही भबिष्य मे होने बाला । जय स्वराज ।

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