दबाब के दर्द से कराहते दल , खण्ड खण्ड सियासत हुई बैलगाम


शोसण के खिलाफ उठा तूफान , तार तार होते सामाजिक सरोकार 

सत्तागत सरोकारो मे , दम तोड़ते सियासी , मूल्य सिद्धांत 

वीरेन्द्र शर्मा 


2 अक्टुबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र. 

म.प्र. के बुदेंलखण्ड के संभाग मुख्यालय पर छिड़े सामाजिक सग्राम के पीछे की सच्चाई जो भी हो मगर सागर के खेल मैदान से उठ रही आवाजे डराने बाली है जिसमे सामाजिक संघर्ष के पदचाप स्पस्ट सुनाई पढ़ते है । बैसै भी आज के लोकतंत्र मे सामाजिक चेतना की आढ़ मे किसी भी समाज का किसी अन्य समाज बिशेष के खिलाफ व्यक्तिगत या मंचो से बिष वमन सियासी लाभ के लिये आम बात हो गयी है और ऐसा नही कि ऐसा बिष वमन आज ही हो रहा है अगर हम यो कहै की गाहै बगाहै बिष वमन का दौर सियासी या सत्तागत लाभ के लिये विगत तीन दशको से खुलेयाम चल रहा है समाजो के बीच समरसता के विधान को स्वीकारने बाले विधान रक्षको के रहते सब कुछ हो रहा है कारण लोकतांत्रिक दलो का सत्ता की खातिर पीछे रास्ते बिष वमन की स्वीकार्यता और सियासत मे संख्या बल वोट की खातिर दबाब कि सियासत को अघोषित दौर पर स्वीकारना कभी इतना भयानक रूप भी ले सकता है जिसकी कलपना शायद ही किसी ने की हो मगर कहते जब किसी भी चीज का घड़ा भर जाता है तो उसका फूटना लाजमी होता है । आज जिस नई चिंगारी ने जन्म लिया है भले ही वह फिलहाॅल किसी को न झुलसाये मगर इसके दूरगामी परिणामो से इन्कार नही किया जा सकता जिस तरह से आज एक समाज विशेष सीधे तौर पर सत्ता प्रमुख उनकी सरकार के सहयोगी पर खुलेआम पक्षपात का आरोप और न्याय के स्थान पर अन्याय का आरोप लगा रहा है इससे समाजिक दबाब की सियासत करने बाले सियासी लोगो को अवश्य लाभ हो सकता है मगर उन दलो को कलंकित होने से कोई नही बचा सकता जो खुद भी ऐसी सियासत के शिकार होते है कोई दल पहले तो कोई बाद मे ऐसी सियासत और समाजिक दबाब के सहारे अपनी सत्ता सियासत बनाये रखने बालो के हाथो ब्लेक मेल होते रहते है । जिस तरह से विभिन्न समाजो के बीच आज सत्ता सियासत की खातिर बैमन्सयता का भाव पैदा हो रहा है यह कोई अन्यास नही बल्कि यह एक सोची समझी रणनीति का भी भाग हो सकती है मगर इस बात से कोई इन्कार नही कर सकता कि सामाजिक हनक का सत्ता सियासत दल सभी को सत्ता के लिये स्वीकारना पढ़ रहा है अगर हम उन दलो को छोड़ दे जो या तो ठेके या जागिरो के आधार पर गैंग गिरोहबन्द चल रहै जिनका अपना कोई मजबूत वैचारिक आधार नही बचा है और अब उनका आधार वही बचे है जो शीर्ष नेतृत्व को भी आॅखे दिखाने नही चूकते तो कभी दबाब चलते उन्है नये सिरे जड़े तक नही जमाने देते मगर अफसोस की बात तो यह कि कुछ ऐसे भी दल है जो संगठनात्क और वैचारिक आधार पर मजबूत होने के बाद भी सामाजिक दबाब बस बदलाब करने मे हाफनि भरते जान पढ़ रहै वह भले ही अपने संगठनात्मक आधार कि कितनी ही डीगे कितनी ही क्यो न मारे मगर सामाजिक दबाब बस वह हिम्मत नही जुटा पा रहै कि खण्डित होते समाजो के बीच छिड़ते संघर्षो पर विराम लगा पाये मगर जो चिंगारी सागर बुन्देल खण्ड मे सुलघ रही है वह सामाजिक समरसता के मार्ग को कही विखडित न कर दे बैसै भी बुन्देलखण्ड की कहावत से हर समझदार परिचित है एक सौ डण्डी एक ..............? बैहतर हो सामाजिक यांत्रिकी की सियासत को यही विराम लग जाये तो बैहतर क्योकि इस मर्तवा जिस समाज के साथ के साॅशल इन्जीनियरिंग का सियासी दांब दिखाई पढ़ रहा हे कही ऐसा न हो कि आक्रोश बस मानव धर्म और मानव धर्म रक्षा के लिये अपना सब कुछ दांब पर लगाने बाले बिचलित हो किसी ऐसे रास्ते पर न चल पढ़े जो किसी के हित मे न हो आज खास ऐसे दल सियासत करने बालो को यह समझने बाली बात होना चाहिए । 


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