सजृन में आग्रह , अहिंसा का तिरस्कार ही अहंकार है
सर्बकल्याण मे श्रेष्ठता श्रेष्ठ , आचरण ,संस्कार ,व्यवहार की आग्रही होती है , फिर वह सत्ता हो या फिर सेवा
व्ही. एस. भुल्ले
3 अक्टुबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा म.प्र.
हजारो बर्ष की त्याग तपस्या परमपिता परमात्मा के साक्षात या श्रवण युक्त सृजन में जीवन के मूल संदेश , सृष्टि मे मौजूद ज्ञान विज्ञान साक्षात गुरूकुल विश्वविद्यालयो के बाबजूद अज्ञानता या उस विद्या से असंवाद की स्थति मे जीवन के श्रेष्ठतम मूल सिद्धान्तो से संघर्ष जीवन मे कोई नई बात नही यह तो अनादि काल से जीवन के बीच रहा है मगर श्रेष्ठ समृद्ध खुशहाॅल जीवन की जिज्ञासा ने मानव को हमेशा श्रेष्ठ कर्म के माध्ययम से जीवन को सिद्ध करने का मार्ग प्रस्त किया है उसके रूप स्वरूप जो भी रहै है मगर सत्य एक ही रहा फिर वह तब की स्थति मे रहा हो या फिर अब की स्थति मे हो उदय और अस्त जन्म और मृत्यु के बीच की या़त्रा जैसी भी रही या रही हो मगर सत्य हमेशा एक ही रहा है । और रहेगा यह मानव जीवन को वह , जिस विद्या माध्ययम से समझे या फिर अनभिज्ञ रहै मगर जिसने भी इसे जानने की कोसिश की या थोड़ा वहुत भी समक्षा उसका जीवन भी सफल रहा और सिद्ध भी हुआ अनेको उदाहरण आज दुनिया मे लोगो के सामने है मगर समझ की कमी तब भी मानव जीवन को कलंकित करती रही और आज भी कर रही है कहते आग्रह अहिंसा का सम्मान ही श्रेष्ठजनो का आचरण कहा गया है और कल्याणउन्मुखी व्यवहार उसका चरित्र फिर ऐसे लोग सत्ता में हो या फिर सार्वजनिक जीवन मगर दुर्भाग्य की आज भी जब तब यह देखने सुनने मेहसूस करने मिल जाता है कभी कभी सज्जनो पुरूषो के साथ सामथ्र्य सत्ता का व्यवहार सार्बजनिक जीवन मे बड़ा ही घातक सिद्ध रहा है क्योकि कहावत है कि श्रेष्ठ सज्जन पुरूषो की गोद मे सृजन विनाश दोनो खेलते है इसका सन्तुलन ही जीवन का सही अर्थ है जहर से जीवन रक्षक दवा तो उसके दुरूपयोग जीवन को खतरा बना रहता है बैसै सन्तुलन ही सृष्टि का नियम कहा गया है । कहते है सत्ता या शासन का चाकर भी उसका प्रतिबिन्ब होता है जो आम खास को अपने आचरण व्यवहार से यह सिद्ध करता है कि सत्ता और शासन मंशा , चरित्र कैसा है और उसके सर्बकल्याण का भाव कैसा है काश इस सच को समझ प्रकृति मौजूद उस सत्य से सीख ले जीवन के सत्य को समझ पाये तो यह जीवन की बड़ी सार्थकता है । वरना बड़े बड़े शूरवीर सम्राट रहै मगर आज उनका नाम लेने बाला पानी देने बाला कोई नही आज मौजूद एक ऐसा इतिहास है जो हमे बहुत कुछ सीखने समझने की सीख देता है । आज भी ऐसे महामानव के मार्ग पर अग्रसर हमारे बीच कई लोग ऐसे है जिनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है मगर विरोध के लिये विरोध के स्वरो से सत्ता तो हासिल हो सकती है मगर वह सम्मान सार्बजनिक जीवन मे हासिल नही हो सकता जो हर मानव जीवन की चाहत रही है । कहते है विरासत से भीख तो हासिल हो सकती मगर सम्मान नही सम्मान तो व्यक्ति अपने श्रेष्ठ कर्मो से ही हासिल कर सकता है काश इस सच को समझ हम व्यक्ति न सही उस पद प्रतिष्ठा का ही सम्मान करना सीख जाये जिसे हमने अपने अपने विधान के साथ संबिधान के अनुसार अंगीकार किया है । आज बड़ा दुख होता है जब कुछ स्वार्थवत लोगो पवित्र पदो को शुसोभित करने बाले त्याग तपस्वीयो के लिये उनकी जीवन मे कृतज्ञता को सबाल करते है बैहतर हो हम आग्रह और अहिसा के मार्ग को प्रस्त करने मे अपना योगदान उस प्रतिबद्धता के लिये करे जिसके लिये हमे यह मानव जीवन हासिल हुआ है या फिर हम मानव जीवन मे है । जय स्वराज ।

Comments
Post a Comment