सार्बजनिक जीवन में संत्तव, सामर्थ , पुरूषार्थ से सिद्ध परिपूर्ण प्रमाणिक परिणाम किसी श्रेय या पहचान के मोहताज नही होते
बशर्ते परिणाम सृजन के सारथी और सामर्थ सिद्ध हो
जीवन में कृतज्ञता से शिकायत , सरोकार हो सकते है , मगर वह कभी व्यर्थ नही हो सकते , जो जीवन का आधार भी है
व्ही. एस. भुल्ले
7 अक्टुबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
मानव जीवन मे कोसने सराहने का जो संघर्ष कृतज्ञता के नाम सृजन मे आज कल चल रहा है उसको लेकर जीवन मे शिकायत सरोकार हो सकते है मगर कहते कृतज्ञता कभी व्यर्थ नही हो सकती क्योकि मूलतः वह जीवन का आधार है और सार्बजनिक जीवन में संत्तव सामर्थ पुरूषार्थ से परिपूर्ण प्रमाणिक परिणाम किसी श्रेय या पहचान के मोहताज नही होते बशर्ते परिणाम सृजन के सारथी और सामर्थ सिद्ध हो मगर स्वस्वार्थ में डूबे उन जीवनो का क्या ? जो स्वकल्याण को ही सर्बकल्याण मान जीवन पर्यन्त सामर्थ की सार्थकता और पुरूषार्थ पर सबाल खड़े कर स्वयं को सिद्ध समझते रहते है अफसोस कि ऐसे लोगो को जीवन पर्यन्त इस बात का एहसास ही नही हो पाता की अन्त समय जो जीवन कष्ट मे है सब कुछ होने बाद उसके पीछे के परिणाम क्या है ? बहरहाॅल सृजन मे ऐसे कई परिणाम प्रमाण जीवन मे रहै है और है मगर जीवन आज भी यह स्वीकारने तैयार नही सार्थक सफल जीवन के मायने क्या है जिस संस्कारिक भूभाग पर समृद्धि की पदचाप उसकी आवो हवा मे मौजूद है उसी भूभाग पर समृद्धि के मोहताज जीवन को कौन समझाये की त्रुटी कहा छुपी है आज समझ संस्कार के जिस महासागर मे जीवन हिचकोले ले रहा है उसे किनारा किस कीमत पर कब मिलेगा यह कोई नही बता सकता मगर इतना तो तय है कि आज भी यह संघर्ष नही रूका तो मानव जीवन एक ऐसे अधकांर की ओर बढ़ने बाला है जहा उसकी सृजन मे उपायदेयता सिर्फ एक जीव से अधिक और कुछ न होगी आज हर जीवन को यही समझने बाली सबसे बड़ी बात होना चाहिए । जय स्वराज ।
Comments
Post a Comment