तार तार नैतिकता में बैबस संस्थाये , बिलखते सरोकार
बैलगाम सियासी संघर्ष में जीवन हुआ निढाल
सबैधानिक जबाबदेहियो पर गंभीर सबाल
वीरेन्द्र शर्मा
8 अक्टुबर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा
यू तो सत्ता का सामर्थ अनादिकाल से स्वभाव अनुरूप आम जीव जगत भोगता सराहता आया है जो इतिहास मे आज दर्ज है और श्रेष्ठ परिषद सभाओ मे जन कल्याण की खातिर समय बैसमय उनका उल्लेख भी आदर अनादर के बतौर किया जाता है कहते है इतिहास होता ही उस आभास के लिये है जिससे आम जीवन मौजूद जीवन या जीवन के भबिष्य को बैहतर बनाने उससे सीख ले एक ऐसे वातावरण का निर्माण कर सके जिससे ख्याति या सिद्धता आम जन जीवन मे सराही जा सके और मानव जीवन की उपायदेयता सिद्ध की जा सके । मगर आज कल छोटे से छोटे या बड़े बड़े से ऐसे घटनाक्रम जो सृजन ही नही आम मानव जीवन के कलंक कहै जाते है उन पर कुतर्क पूर्ण व्यान नैतिकता को तार तार करने बाले सबाल आम जीवन ही नही जीवन सरोकारो को झझकोरने काॅफी है । मौजूद सियासत मे हद तो तब हो जाती है जब स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करने जीवन को कलंकित करने बालो के पक्ष मे ऐसी ऐसी दलील और उदाहरण प्रस्तुत किये जाते है कि सिर्फ मानवता ही नही नैतिकता भी शर्मा जाये और सार्बजनिक जीवन मे तार तार हो वह भी अनाथ या बैबा नजर आये अब ऐसे मे सबसे बड़ा धर्मसंकट तो उन संस्थाओ का है जिनके कंधो पर इसकी रक्षा संरक्षण संर्बधन का वैधानिक भार है कारण आज की सियासत मे जिस तरह से सियासी संघर्ष के चलते जीवन निढाल पढ़ा है वह किसी से छिपा नही और जिस तरह से संबैधानिक जबाबदेहियो को लेकर सबाल आम है उन्है न्यायोचित नही कहा जा सकता क्योकि विधान , विधान होता है वह लिखित हो या अलिखित हो उसका पालन तो आम या खास जीवन को ही करना होता है और नैतिकता को सामने रख न्याय का पक्ष रखा जाता है मगर जब मानव जीवन मे सियासत बैलगाम हो जीवन सराकारो से ही द्रोह पर उजारू हो जाये तो फिर शिकायत कैसी । ये सही है न्याय और नैतिकता की रक्षा मे निर्णय होते है वह लोकप्रिय भी हो सकते है और समय के साथ अलोकप्रिय भी हो सकते है मगर ऐसे निर्णयो पर सियासी दांव खेलना सिर्फ सियासत ही नही संस्था , जीवन सरोकारो से भी द्रोह है और आने बाली पीढ़ियो के अपसगुन जो न तो कभी सार्थक रहै न ही सिद्ध हुये न ही उन्है कभी सराहा गया यह बात समृद्ध जीवन सर्बकल्याण मे आस्था रखने बालो को समझना चाहिए सिर्फ सियासत के लिये विरोध या सियासी शै मात के डर से सत्य को अस्वीकारना किसी के हित मे नही न तो इससे सत्ता सियासत न आम जीवन या जीवन सरोकारो का भला होने बाला है न ही ऐसे कृत्यो से कोई महान इतिहास लिखा होने बाला है इतिहास सामने है झूठा हो या सत्य या सियासी सत्तागत सरोकारो को साधने लिखा गया वह असत्य बैहतर हो कि हम ऐसी किसी भी परम्परा या कलंकित कृत्यो को पृस्य न दे जिनका खुद का तो कोई भबिष्य तब था न ही अब है और न ही भबिष्य मे रहने बाला है । कास इस सत्य को साक्षी मान पुरूषार्थ हो , हर क्षैत्र मे न्याय हो नैतिकता की छत्रछाया मे तो यह महान संस्कृति संस्करो के उत्तराधिकारी सबसे बड़ा धर्म कर्म होगा ।
Comments
Post a Comment