भरोसा तोड़ते भाग्यविद्याता , जन जीवन हुआ निराश


ज्ञान के अभाव में पीढ़ियो से द्रोह दरिद्रता के संकेत 

विनाश पर उतारू जीवन की समृद्धि विकास 

सत्ता के मोह में डूबा पुरूषार्थ 

व्ही. एस. भुल्ले 


2 नबम्बर 21 विलेज टाइम्स समाचार सेवा 

या तो विधान बनाते वक्त कुछ कमी रही गई या फिर विधान अंगीकार करते वक्त वह निष्ठा जीवन में नही रही परिणाम कि मौजूद जीवन उस विधान को अक्षरशः स्वीकारने तैयार है न ही उस विधान को बनाने बाले लोगो को वह सम्मान देने तैयार है जिन्होने इतिहास को साक्षी मान बर्तमान की मौजूदगी मेे जीवन के भबिष्य को खुशहाॅली समृद्धि के लिये गढ़ने का काम किया निश्चित ही सोच ज्ञान के प्रकाश मे एक ही रही होगी कि उनका जीवन तो जैसा कटना था कट गया मगर आने बाली पीढ़ी इस दरिद्रता से दो चार न हो अब इस दरिद्रता के कई क्षैत्र हो सकते जैसै धन , ज्ञान , सामर्थ , पुरूषार्थ , संस्कारो की दरिद्रता सेवा कल्याण के भाव की दरिद्रता ये तो वह वृहत स्वरूप है जीवन की आवश्यकताओ को जिनके विश्लेषणो इतिहास भरा पढ़ा है मगर एक बढ़ी उम्मीद हर युग हर समय हर जीवन को उस जीवन से अवश्य रही जिनकी आस्था प्राकृतिक सिद्धांत अनुरूप स्थापित विधान मे रही भावना सर्ब कल्याण की रही और सामर्थ पुरूषार्थ का पराकाष्ठा जीवन की समृद्धि खुशहाॅली के लिये रही जिसमे समरता ही नही नैसर्गिक न्याय सिद्धान्त अनुरूप उसकी पालना भी जीवन मे हुई मगर आज जिस जीवन को हम ढो रहै जी रहै है जिसके भबिष्य का आभास आज कुछ जीवनो को हो या न हो मगर यह कभी सुनहरा भी हो सकता है यह समय ही सिद्ध कर सकता है । फिलहाॅल मौजूद जीवन तो सिर्फ समीक्षा उस ज्ञान के प्रकाश मे ही कर सकता है जो आज भी जीवन मे साक्षी है दिग्दर्शी है और प्रमाणिक और प्रभावी भी मगर देर हो चुकी है लेकिन सम्भावनाये खत्म नही । यही आज सबसे बढ़ी समझने बाली बात है । देखा जाये तो समृद्ध खुशहाॅल जीवन के भय को छोड़ बाकी शेष क्षैत्र ज्ञान विज्ञान , सत्ता सौपान , अर्थ धन , सेवा कल्याण , सर्बकल्याण इत्यादि क्षैत्रो मे जीवन को इतना भय व्याप्त है कि क्या जीवन मूल्य , प्राकृतिक , नैसर्गिक , संस्कारिक सभी सिद्धान्त औधे मुॅह पढ़े जान पढ़ते है । दुर्भाग्य तो यह है जीवन ने इसे सिर्फ अध्यात्म नाम अपने अपने कर्तव्यो की इतिश्री कर ली है और यह मौजूद ज्ञान मे होना कोई अपराध नही क्योकि जिसे भान ही नही जन्म मृत्यु दोनो ही विज्ञान की तरह प्रमाणिक है जिसमे संदेह होना तो सिर्फ और सिर्फ ज्ञानविभुती होने का ही प्रमाण हो सकता है क्योकि जीवन मे असंभव कुछ भी नही । मगर अफसोस कि जिस सामर्थ पुरूषार्थ पर जीवन गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करता है आज जिस तरह से दरिद्रता के भय के चलते भाग्य विधाता बन भरोसा तोड़ा है वह किसी विकास नही बल्कि बिनाश के संकेत हो सकते है जिस जीवन को सबारने निहारने न जाने कितने जीवनो ने समुचा जीवन हजारो सेकड़ो बर्षो के श्रम परिश्रम के बल खड़ा किया और मानव की श्रेष्ठता तथा उसे पशु पेड़ पक्षियो से अलग जबाबदेही और स्वयं की सिद्धता सिद्ध करने का अवसर दिया वह जीवन शेष जीवनो को निराश कर रहा है । जो किसी भी जीवन के लिये उचित नही इस पर समझ रखने बाले उन जीवनो को विचार अवश्य करना चाहिए क्योकि जीवन आज जिस भयाभय मार्ग का यात्री बनने सबकुछ दांब पर लगा भयमुक्त होना चाहता है वह भय का अन्त नही भय का अंत तो तब होगा जब ज्ञान के प्रकाश मे जीवन अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप अपनी सिद्धता सिद्ध करेगा । जय स्वराज । 


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